कुल्ली भाट | Kulli Bhat

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Kulli Bhat by श्री सूर्यकान्त त्रिपाठी - Shri Suryakant Tripathi 'Nirala'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मजिल चढ़ने के मुकाबले यहूं अति दुच्ठ था, फिर वहा वेश्या, यहाँ घमपत्नी । श्रागें वढा । एक का ब्ौर श्राया, सालूम हुमा इस दर में धूप से हवा मे गर्मी ज्यादा हैं। फिर भी हवा में प्रतिकूल चलना डी होगा । कालिदास को पढ़ रहा था, याद झाया--“अजयदेकर्था से मोदिनीम” , बडाई से पैर झाग चढ़ाया, ठकाद़ा जूते न काकर स॑ से ठोकर लो, श्रीर मुह फैला दिया । सोचा, वॉक्स में एव जोड़ा झौर है नया । तमलली हुई, फिर झागे वढा । एक भोवा श्रौर झाया । भबते छाता उलटकर दूसरी तरफ तना । हवा के रुख पर करके, सुधारवर ताड लिया 1 आगे लोन-तदी आयी, जो श्राठ महीन सूखी रहती है, श्रौर जिसमा विनारे ससार वे श्राधे वेर बदूल है, शायद इसी वारण इस प्रात का नाम कभी चनौधा था--“बारह कुवर बनोधे केर ।” स्वत ता प्रेम भी भ्रविव था, छोटो-सी जगह ग वारह कुवर थे । धोती काछदार जगाली पहनी थी । एक जगह उडी, शरीर यर की बाहा से श्राविगन किया, न घ्रब्र छोड़े, न तब--' गुला स खार हैं, जा दामन थाम लेते हैं” याद तो श्राया, पर वडा गुस्सा लगा । सैकडा घाट चुने हुए । धोतली उप्पनदुरी हो 'रही थी । छुगति नहीं बनता था 1 देर हो रही थी 1 श्राप्लिर मुटठी से कोछे वो पवडकर सीचा । धोनी में सहस्र-धार गगा धन गयी, उधर बेर सहन विजय ध्वज । चोती कीमती थी ,--शान्तिपुरी, जास समुराल वे लिए सी गयी थी, जैसे प्रसिद्ध नेखव खास पत्र के लिए लेख लिखते हैं । सा हुई मि गई झौर हूं। नदी गम स ऊपर भ्राया । बुछ दूर पर वहटा-दमदान मिला । दो ही मील पर देखा दुद्ा ह। गयी है, जले धूल का सम दर नहाकर निकला हू । स्टेशन मील-मर रह गया था गाड़ी वा अराटा सुन पडा । अपने श्राप पेर दौडन लगे । मन ने बहुत कहा, दडी झभदता है। लेकिन जसे पैर व॑' भी जवान लग गयी हो, भट्ता कुछ वाकी नी रह गयी है ? घर लौटकर जामोगे, डिदगी-भर गाववाले हसेंगे--वावू बनशर ससुराल चले थे । हजार हजार सपाट का “ठान तो देखो ।* कहते पर बेतहागा उठ रहे थे । छाता बगल मे । हाथ मे जूते । सामने मील भर वा कमर । बुल्ली भाट / १४




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