अंतर की बात | Antar Ki Baat

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अन्तर की बात ইओर दूसरी बार जब मैंने गोरी को देखा, वह योवन की किश्ती पर खड़ी थी | उसका रूप फूटा पड़ता था ओर आंखों की चंचलता के स्थान पर गंभीरता की एक छाया ने घर कर रखा था ।में बोला--“गोरी...१”लाज से वह लाल हो उठी ।“आज तुम्हें कितने दिनों बाद देखा है...।गोरी चुप रही ।“वहाँ क्या मन लगता है, गोरी ? मोटी-मोटी किताबों को लेकर जब पढ़ने बेठता हूँ तब तुम्हारी याद आ जाती है......।'गोरी ने सिर का आँचल ओर खींच लिया ।में बोला-सुना है, तुम्हारे व्याह के लिये तुम्हारे बाबूजी परीशान हैं. ..मुझे अपने ब्याह में बुलाओगी, गोरी...९”मेंने देखा, गोरी का चेहरा पीला पड़ गया है ।( २ )ओर, एक दिन जब मुझे यह खबर मिली कि गौरी का ब्याह एक अधेड़ व्यक्ति से कर दिया गया, तो में मानो संज्ञाहीन हो गया । प्रोफेसर लेक्चर दे रदे थे, किन्तु मेरा मन एक व्यथा से भर गया था । जाने एक केसा अभाव मेरे प्राणों मे समा गया ।घर मने पर गोरी की मांसे भट करने गया । उसने आंचल से आँसू पींछते हुए कहा था--भेया, हम गरीब ओर कर दी क्या सकते थे? तिलक-दहेज के लिये रुपये कहाँ से लाते ९




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