हिंदी को मराठी संतो की देन | Hindi Ko Marathi Santo Ki Den
श्रेणी : साहित्य / Literature

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
29 MB
कुल पष्ठ :
540
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)घ॒ 1 हिन्दी को मराठी संतों की देनराम नाम की लुट है, लुट स्के तौ लूट
घड़ी गई पस्तायगा प्राण ज्यायगा दूर ॥
>८ ১৫ > >
| लेना गुरु का ज्ञान
देना धन तन मान
करना अमिरत पान
होना अमर निदान
>< >
वेश्या सू यारीन करणा
उस यारी स दोजख जाणा |
वेश्या सालिम (जालिम) नंगावणाहारी (नंगा बनानेवाली)
वो जीनने मानी अपनी प्यारी ।
दुनिया दारकू करे मिकारी
सालिम बुरी वो सोबत
माल सरे न वेढे सात
माल सरे तो मू ना देखे
माल सरे तो यारि ना राखे
| তা ভু হাসু অহ थूके ॥
शिवराम के उपयुक्त कुछ दोहे प्राचीन हिंदी-संतों की अनुकृति प्रतीत होते हैं। यही
कारण है कि उनका भाषा-प्रवाह उनकी अन्य रचनाओं की अपेक्षा अच्छा है ।देवदासये रामदासी शिष्य-मरुडल के अन्तर्गत हैं और अपने धमं के प्रति अत्यधिकके
की तीखी भत्सना करते हैं। ये दादेगाँवलकসিनिष्ठावान् हँ । उसपर प्रहार करनेवालों
के रामदासी मठ के अधिपति थे |
इनके स्फुट मराठी पद और चौबीस श्लोकों का गजेन्द्र मोक्ष! कथाकाव्य प्राप्य है
हिन्दी में भी इनकी स्फुट रचनाएँ मिली हैं। एक पद है जिसमें कृष्ण-गोपी-प्रेममाव
की व्यंजना है--- |
देख्यो रे माई ब्रहुरूपी का स्याल ॥ धृ °|
नव नागर (अमीन) नवरस लीला
गजेब बने नंदलाल ।
दस अवतार राम कृष्ण बन्यो है
सब गोपी खुशाल |
१, समात् होने पर । २, साथ |
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