अंगारे न बुझे | Angaare Na Bujhe

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Angaare Na Bujhe by रागेय राघव - Ragey Raghav

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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तिरिया शा १ পি गाँत्र के लोगों ने देखा --आगे-आगे पिल्ली चला श्राता था । उसके काले सीने का एक हिस्सा उसकी फिवूही के बन्द में से निकल रहा था ओर लम्बी-लम्बी मूँछुं होंठों पर फैल रही थीं। लम्बा-चौड़ा आदमी था। घुटनों से ऊँची धोती, पाँव के जूते कन्वे पर रखे लट्ट में टंगे हुए ये । आज उसकी चाल में एक उमंग थी | आज तक पिल्ली को किसी ने नहीं देखा था | यदि किसी ने उस पर निगाह भी डाली तो ऐसी कोई बात ही नहीं मिली जिस पर आँख ठहर जाती | उसमे क्या था १ कुछ नहीं । पाँच-एक बीघे जमीन थी और वह उसी पर सब कुछ भूला हुआ हर एक से अपनी शादी का जिक्र छेड़ देता। पैंतीस-छतत्तीत साल के उस आदमी से कोई भी अ्रपनी लड़की ब्याहने को तैयार नहीं होता था | इतने बड़े आदमी का भला कभी ब्याह होता है ! उसकी ब्याह की बात गाँव में एक मजाक की तरह थी। एक बार जब वह पटवारी से बात कर रहा था तो प्यारी ने कह दिया कि बाकी नम्बरदारों ने तेरी जमीन दवा ली हे। असल में तेरे पास पेंतीस बीघे भूमि है । पिल्‍्ली ने सुना तो जैसे-जैसे उसकी आँखों में फैलती, बढ़ती हुई धरती दिखाई दी; उसके साथ ही साथ एक उसी के शब्दों में, बैयर” भी आ खऊी ६६; गोया धरती ओर स्त्री का ऐसा जोड़ा था, ऐसा संग था, कि इनमें से एक न होने पर दोनों का ही होना कठिन है। बहरहाल पिल्ली ने नम्बरदारों. से कहा-सुनी की और जब उसे मालूम हुआ कि पटवारी ने मसखरी की थी, तब वह विरक्त हो गया | गाँव से मन उचट गया। नम्बरदारनियों ने ताना कसा--“बैयर के लिये दूसरों के खेत छीनोगे १?




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