गगनभेदी | Gaganbhedi

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Gaganbhedi by प्रशांत पाण्डेय - Prashant Pandeyवसन्त - Vasant

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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का प्रकार एक है, वैसे ही, नियति के थाद्धानों के साथ टकर মর समय, उनकी वृत्ति ओर उनके अटल संकल्प समान हैं। इन सभी माणक की प्रति हली है भौर अंतःकरण काव्यमय है। इसीलिए इस सामान्य ढंग से घिसटने वाली, कदम-कदम पर व्यवहार बनने वाली इस पेट- बालू संकीणे डेढ़ वालिश्त की दुनिया में उन्हें अपमानित होना पड़ता है, उनकी सूते आम खिल्ली उड़ाई जाती है। ये सभी नायक कभी न कभी पागलपन की सीमा छू लेते है और उनको वदनसीबी के लिए विसी न किसी प्रमाण में जिम्मेदार होती है एक नारी--उस नारी के विविध रूप, उसकी तरह-तरह की बेवफाई, कभी माँ, कभी पत्नी, और वी बेदी के रूप में । यह सब होते हुए भी थे सभी नायक स्वयं ही अपने दुर्भाग्य के शिल्पकार होते हैं । हेमसेट, मेव वे थ, ऑयेल्लो और लियर ये शक्तिशाली चरित्र-चित्रण अवश्य हैं किन्तु मूलरूप से ये चारों मतोवृत्तियाँ हैं, साथ ही मानसिक अवस्थाएँ भी हैं। एक समय मन में यह विचार आया कि अगर ये चारों मत की भिन्‍न अवस्थाएँ हैं तो फिर ये किसी एक व्यवित के जीवन में भिन्‍न-भिन्‍त समय पर प्रकट भी हो सकती हैं। यह परागमन किसी एक व्यवित में भी संभव है। इस विचार पर मेरा मनमंथन होता रहा ओर मुझे इस अन्वेषण में, इन शोकात्माओं के जीवन-संधर्ष का एक प्रमुख सूत्र प्राप्त हुआ जिसे मैंने नाटक में गूंया है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो जीवन भर एकाकी रहा, ध्वस्त रहा पहले अपनी माँ के कारण, फिर अपनी पत्नी की वजह से और अन्त में अपनी बेटी की***। इस सूत्र को गूंधते समय मेरे दिमाग में क्रमशः एवः आकृति ने रूप लिया 1 पते यंक मेँ हैमतेट, दूरे अंक मँ मकवेथ तथा अयेल्लो ओर तीसरे अंक में किगलियर, एक ही नायक के चित्रण तें ये मिन. भिन्‍न मनोवृत्तियाँ बीतते समय के राय साकार होती जाती हैं। यह मूत्र और इन आकृतियों के रेखाचित्र अवने मन में रखकर मैंने भारतीय पृष्ठभूमि में जिस नाट्य कृति को रचने का प्रयास किया, उसका ही नाम है गनभेदी' 1 দু টি कितना सफल हो पाया है यह तो इसा क्षेत्र के विशेष ही बता “गगननभेदी' नाटक का मराठी भाषोय पहला रंगमंच-प्रदर्शन, लंदन स्थित 8 शस्या हारा सुवणं महौत्सव समारोह के अवशर पर, लंदन के गोल्डन थियेटर मे दिनांक 9 अवतूबर 1982 को सम्पन्न हुआ था| उसके बाद इस नाटक को बम्बई की चंद्रलेसा नामक नाद्य संस्था ने रंगमंच पर खेलना ध ৮ । न्ववर 1982 से यह्‌ नाटक मंच पर खेला जाने लगा और यह টি রে इन दो-तीन वर्षों में इस नाद्य संस्था ने महाराष्ट्र के ह हुए; में करीवन 300 বাং यह नाटक खेला है और अभो भी इसे




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