जीवन के चार अधयाय | Jivan Ke Char Adhyaya

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : जीवन के चार अधयाय - Jivan Ke Char Adhyaya

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about अज्ञात - Unknown

Add Infomation AboutUnknown

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१२ जीवन के चार अध्याय विदेशी बस्त्रों के बहिष्कार मे प्राय: वे ही उपाय काम में लये गये, जो इन्‌ ५७ के गदर मे लाये गये थे--प्रत्येक समचारपत्र, प्रत्येक नेता यही प्रचार कर रहा था कि विदेशी बस्त्रों में गाय की चरबी और सूअर की चरबी देकर चमवःऔर मजबूती जाई जाती है--इसलिए विदेशी वस्त्रो को धारण करने को कौन कहे, उन्हें छूना तक पाप है। इस मावना को उमार कर विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार में देश के नेताओं को आज्ञातीत सफलता मिलो। सारे विदेश्षी वस्त्रो को कीमती पोझाकों को आग मे सौपकर मन में विचित्र आत्मप्रसाद और आध्यात्मिक आनन्द का अनुमव हुआ, जैसे जनम-जनम का पाप कट गया हो। देझ्ष के प्रति, मारतमाता के प्रति एक सर्वंथा नई, परन्तु परम निर्मल प्रीति का उदय हुआ। छगा जैसे जीवन सार्थक हुआ। खादी का करता, धोती, चमरौंघा जूता और गाबी-टोपी पहनकर जब स्कूल मे आया, तब देसकर अध्यापकवर्ग और छात्रवर्ग दंग। अरे, यह मरी जवानी मे क्‍या वैराग्य छे बैठा ? चारो ओर से अवाजकणशी होने लूगी। मुझे भी अजीव अटपटा रूग रहा था। केकिन अन्दर-अन्दर बडी प्रसन्नता का बोध हो रहा था। उन दिनो आज कौ-मी नफीस खादी नहीं मिलती थी। ३ गज '४४इंच की खादी की घोती शरीर पर घारण करना घोर तपस्या ही थी। आरम्म में तो शरीर छिलता था ; घुटनों के पास खून निकछ आता था। उन दिनों कोरी--बिना धोई सुरदुरी, बदशकल, मयंकर सादी आती धौ । खादी का करता भौर टोपी सि्ाने के लिए दर्जियों से विहोरा करना पड़ता था। वे इरते थे कि उन कपड़ों से उनकी मशीन खराब हो जायगी, सूई टूट जायगी। परन्तु, ईदवर-कृपा से खादी का जो छत लिया, सो लिया और वह अब तो वडी शान कै साय निम क्या, जगमगा रहा है। आज तो सादी रौब गालिव करने के लिए और हजारों गुनाह ढक देते के छिए कवच का काम कर रही है--परन्नु कबतक ? कवतक ?? पिताजी के निधन के पश्चात्‌ परिवार में जो भयंकर भूचाल आया, उसका सबसे गहरा धक्का मुझे ही छगा। पिताजी की अजित सारी विपुल सम्पत्ति सभिको मेरे वड़े चाचाजी मे हथिया ल्या और मृझे, मेरी विधवा माँ के साय घर से अठय कर दिया--करीव-करीब राह का फडोर ही बनाकर। हिस्से भे मिला एक टूटा-फूदा घर, जिसमें पहले ग्रोयठा और भूसा रखा जाता था। न तो कोई माँदा-बरतन, न खाद्य-सामप्री। मुझे स्मरण है, विछगाद के दिन बाजार से म चावल, दाख, नमक, ममाला और कुछ अलमूनियम के बरतत सरीद छाया क्रं म सौर मेरो विधवा मा! भरे सिवा उसके कोई संतान नेही, उदः भिवां संसार में मेरा कोई अपना नदी।




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now