तुलसी के चार दल पुस्तक दूसरी | Tulsi Ke Char Dal Pustak Dusari

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Tulsi Ke Char Dal Pustak Dusari  by सद्गुरुशरण अवस्थी - Sadguru Sharan Awasthi
लेखक :
पुस्तक का साइज़ :
8 MB
कुल पृष्ठ :
268
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |

यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

सद्गुरुशरण अवस्थी - Sadguru Sharan Awasthi के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
বালতন্ধা লই ११कर कंकन, कटि किंकिनि, तूपुर वाजइ हो।रानी के दीन्हीं सारी ते सधिक विराजद हो ॥११॥शब्दार्थ---ऊनक तरीवन--सेने के करनफूल । येमरि--नय ।अर्थ --( उक्त नाउन के ) कानों में सोने के करनफूल तथा ( नाक में ) नथ अत्य त भोभा देती हैं। उसके हृदय पर गजमुक्ता की माला तथा गले में मणियें की कठशी ४, यह सबके चित्त के आकपित करती है। उसके हाथों में कंगन (स्री का ककण) और कमर में घु घरदार जंजीर (एक आभूषण) है। परों में विछियों की मधुर ध्वनि होती #। रानी की दी हुई सारी पहन लेने पर बह और भी खुदर लगती है ।टिप्पणी--( १ ) इस छंद में आभूषणों का संज्ञिप्त और विशेष व्थ॑न किया गया है।(२) प्रथम तीन पंक्तियो में स्पष्ट रूप से स्वभावोक्ति ग्रत कार है।काहे रसामजिङ संवर, लदल्िसन गोर हो।कीदहें रानि केासिलहि परिगा भोर हो॥रास अ्रहहिं दसरथ के लबिसन शान क हो।भरत सचुहन भाद्द तो श्रीरघुनाथ क हो ॥१२॥शब्दाधे--फाई--प्यो । सिर -सायर । ওহ নর্থ, क्या कही । भोर परिगा--धेाया हो गया। पहद्धि' ( 'परित )-४ । শান দিত के, तूसरे ( पिता ) फे ।अर्थ--- (साइन कहती 7--) राग ता सावले ४. फिर लबश्मणजी गोरे क्यों हैं ? रानी कौगल्या का धोखा तेा नहीं के गया ९ ( संभव है, उन्होंने अन्य किसी पुरुष यो গা समझ




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :