नानेश वाणी -5 | Nanesh Vani Bhag -5

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Nanesh Vani Bhag -5 by आचार्य श्री नानेश - Acharya Shri Nanesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कषाय समीक्षण/ 3 सर्वदर्शी बन जाता है। क्योकि परमाणु आदि द्रव्यों मे से जो किसी एक को परिपूर्णत जानता है, वह ससार के समस्त पदार्थों को भी सम्पूर्णतया जानता है ओर जो ससार के समस्त पदार्थो को सम्पूर्ण रूप से जानता है, वही एक पदार्थ को समग्रता के साथ जान सकता हे। द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव की अपेक्षाओ से एक-एक पदार्थ की अनन्तानन्त पययि होती है ओर इनका समस्त रूप से ज्ञान कषाय क्षय के पश्चात्‌ ही सम्भव बनता हे। यही नही, कषाय-क्षय के पश्चात्‌ भय की परिसमाप्ति भी हो जाती ই। एेसा साधक पूर्णत निर्भय हो जाता हे क्योकि मोक्ष मार्ग की आराधना मे आस्था रखने वाला तथा तीर्थकर भगवान्‌ हास , प्रतिपादित आगम के अनुसार आचरण करने वाला, अप्रमत्त विवेकवान मुनि ही क्षपक श्रेणी के योग्य होता ই| एेसा पुरुष छह कायो के जीव रूप लोक को सर्वज्ञ भगवान के आगमोपदेश से जानकर किसी भी प्राणी को भयभीत नही बनाता है। वह स्वय निर्भय होता हे, ओर दूसरो को निर्भयता प्रदान करता है, उसके आसपास निर्भयता का पावन-प्रशान्त वातावरण स्वत निर्मित हो जाता हे। कष्‌ाएय-यविरति का मार्गं जो साधक कषायो का क्षय कर देता हे, उस किसी से भी भय नही रहता तथा उससे भी किसी को भय नही रहता है| प्राणियो को शस्त्रो के द्वारा भय उत्पन्न होता हे। ये शस्त्र दो प्रकार कं होते है- द्रव्य शस्त्र ओर भाव शस्त्र। भाव शस्त्रो मे कषायो का मुख्य स्थान हे। ये शस्त्र तीक्ष्ण से तीक्ष्णतर होते हैँ ओर इनका अन्त अशस्त्र रूप सयम से ही होता है। सयम ही कषायविरत्ि का राजमार्ग है। साधना से ही सम्यग्‌ दृष्टा होकर साधक समीचीन कषाय-दर्शी बन सकता हे! आत्मा स्वय ही जब कषाय वृत्तियो का समीक्षण करने लगेगी, तभी उसे स्पष्ट रूप से अनुभूति होने लगेगी कि उसके मूल गुणो का घात करने मे ये कषाय कितने अनर्थकारी हे। उन अनर्थकारी स्वरूप के दर्शन के बाद ही यह अन्तर्दष्टि तथा अन्तर्जागृति




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