मेरे बापू | Mere Bapu

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Mere Bapu by तन्मय बुखारिया - Tanmay Bukhariya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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बन १२३ ~ समाप्त करता हूं कि कलाकार कं कथित मिथ्या श्रम-संश्लिष्ट अहंकार पर दुनिया और भी ताव रखती रहती हँ तथा अपनी शोषण-प्यास बुझाती है । और साहित्यिक हैं कि उन्हें पारस्परिक तू-तू, मैं-में से ही अवकाश नहीं कि अपनी शक्ति का समुचित उपयोग करें। में कह रहा था कि बापू” के जिस स्वरूप के प्रति मेरे मन में कृतज्ञता और आस्था-भाव रहा है वह उनका कलाकार रूप ही था। व्यक्तित्व-विश्लेषण को लिए हमें उपर्युक्त मौलिक दृष्टिकोण को ग्रहण करने की आवश्यकता हे । केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, धार्मिक एवं अन्य क्षेत्रीय व्यक्तियों के प्रति भी यह दृष्टिननीति भली भाँति घटित है। भीतर की कवित्व-जन्य भावुकता छलक-छलक कर जब किनारों तक आ-आ गई हैँ तभी हमारे महापुरुष सच्चे पेग़म्बर हो पाए हैं । जैसा कि मैने ऊपर निवेदन किया, इस संग्रह की कोई रचना कभी लिखी गई और कोई कभी । पुस्तक में उनको काल-क्रमानुसार देने का कोई ध्यान नहीं रखा गया है; अभ्रनायास ही जो जहाँ झा गई, आगई । साहित्य-पारखी किस दृष्टि से इन' रचनाओं को देखेंगे, यह में न तो कह ही सकता हू और न कहना ही' चाहता हैँ; क्योंकि आखिर कसौटी के उद्देश्य से तो कभी कोई कृति होती नहीं और फिर यह तो इस ध्येय से सर्वथा ही दूर रही' है । इस संग्रह की मेरे बापू” शीर्षक कविता पर, जिसके नाम पर कि पुस्तक का नाम भी आधारित है, मेरी सबसे भ्रधिक ममता ह--शायद इसलिए कि उसको लिखकर मै बापू के श्रभाव के श्रपने श्रनमनेपन को सबसे अधिक विस्मृत-सुधि हुआ था । कुछ ऐसी रचनाएं भी इसमें सम्मिलित कर दी गई हैं, जो स्वतंत्रता-दिवस आदि असवरों पर लिखी गई थीं, इसलिए कि बापू के निर्वाण के बाद ऐसा कोई भी राष्ट्रीय उत्सव नहीं होता कि जब हमें उनकी याद न आती हो और हमारे नेत्र सजल न हो उठते हों ।निज कवित्त केहि लागि न नीका' के अनुसार मुझे अपनी वे रचनाएं भी कम प्रिय नहीं हैं । ग्रत में, मुद्रण-कालीन प्रूफ़-रीडिंग आदि परिश्रम के लिए में अपने स्नेह: भाजन श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी तथा श्री परशुराम शुक्ल विरही का सधन्यवाद उल्लेख करना आवश्यक समभता हूँ । ललितपुर 1 । न ३० जनवरी ५१ ) तस्मय' बुखारिथा




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