मेरे बापू | Mere Bapu

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Mere Bapu by तन्मय बुखारिया - Tanmay Bukhariya

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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~ १३ - समाप्त करता हूँ कि कलाकार के कथित मिथ्या श्रम-संश्लिष्ट अहंकार पर दुनिया और भी ताव रखती रहती हँ तथा अपनी शीपषण-प्यास वुकाती है । और साहित्यिक हैं कि उन्हें पारस्परिक तू-तू, मैं-में से ही अवकादझ नहीं कि अपनी शक्ति का समुचित उपयोग करें | में कह रहा था कि वापू के जिस स्वरूप के प्रति मेरे मन में कृतज्ञता और आस्था-भाव रहा है वह उनका कलाकार रूप ही था | व्यक्तित्व-विश्लेषण के लिए हमें उपयूक्त मौलिक दृष्टिकोण को ग्रहण करने की आवश्यकता हैँ । केवल राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं, घारमिक एवं ग्रन्य क्षेत्रीय व्यक्तियों के प्रति भी यह दृष्टि-तीति भली भाँति घटित हैँ । भीतर की कवित्व-जन्य भावुकता छलक-छलक कर जब किनारों तक आ-ग्रा गई हैँ तभी हमारे महापुरुष सच्चे पैग़म्बर हो पाए हैं । जैसा कि मैंने ऊपर निवेदन किया, इस संग्रह की कोई रचना कभी लिखी गई और कोई कभी । पुस्तक में उनको काल-क्रमानुसार देने का कोई ध्यान नहीं रखा गया है; अनायास ही जो जहाँ थ्रा गई, आगई । साहित्य-पारखी किस दृष्टि से इन रचनाओं को देखेंगे, यह में न तो कह ही सकता हूँ और न कहना ही चाहता हूँ; क्योंकि आखिर कसौटी के उद्देश्य से तो कभी कोई कृति होती नहीं ग्रौर फिर यह तो इस ध्येय से सर्वथा ही दूर रही है । इस संग्रह की 'मेरे वापू” ज्ञीर्षक कविता प्र, जिसके नाम पर कि पुस्तक का नाम भी आधारित है, मेरी सवसे अधिक ममता टं -- शायद इसलिए कि उसको लिखकर में वापू के अ्रभाव के अपने श्रनमनेपन को ससे अ्न्विक विस्मृत-सुधि हुआ था । कुछ ऐसी रचनाएं भी इसमें सम्मिलित कर दी गई हैं, जो स्वतंत्रता-दिवस आदि असवरों पर लिखी गई थीं, इसलिए कि बापू के निर्वाण के वाद ऐसा कोई भी राष्ट्रीय उत्सव नहीं होता कि जब हमें उनकी यादन भ्राती हयो ग्रीर हमारे नेव सजल न हौ उठते हों ।निज कवित्त केहि लागि न नीका' के अनुसार मुझे अपनी वे रचनाएं भी कम प्रिय नहीं हैँ । अंत में, मुद्रण-कालीन प्रूफ-रीडिंग आदि परिश्रम के लिए मैं अपने स्नेह- भाजन श्री लक्ष्मीनारायण तिवारी तथा श्री परशुराम शुक्ल विरही' का सबन्यवाद उल्लेख करना आवश्यक समभता हूँ ललितपुर | । ३० जनवरी ५१ 1 --“तन्मय' वुखारिया




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