मुक्ति की राह | Mukti Ki Raah

Mukti Ki Raah by डॉ. एस. पी.खत्री - Dr. S. P. Khatri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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मुक्ति की रा ७७ यह सूचना मिल जाती कि श्रमुक दावत में श्रमुक रईस श्राने वाला हैं छाथवा श्रमुक॒ सम्पत्ति-बान स्त्री आने वाली है तो दह दावत में नि्मंत्रेण पाने के निए एड़ी चोटी का पसीना एक कर देते | उन इसमें सफलता भी मिल्नती | जिस तरह से शिकारी अपने शिकार्‌ की भलक पाकर उसके पीछे घंटो चला करता है श्र श्रस्त से सफल होता है उसी प्रकार इलियट सम्पत्ति-पण विधवाश्रों के पीछे ह्ोरे डालते थे । इस उद्देश्य की पूर्ति में तन १४ १४ की पहली लड़ाई उनके लिये स्वण- अवसर ले आई । जब लड़ाई समाप्त दोने ही वाली थी वे घायलों की सेवा करने वाली फोजी टुकड़ी के नायक बने गये और. प्रहले पहल फ्लैन्डस में श्रपनी के लिये सरकार से स्वण पदक प्राप्त किया । तसपश्चात वे पेरिस आ्राए और वहाँ भी उन्हें सम्मान-सूचक पदक मिले । एक वर्ष के अनन्तर दी उन्होंने अपनी इस सफल देश-सेवा से इतना घन इकट्ठा कर लिया कि उनकी प्रायः पूछ होने लगी । जब जब नगर का कोई प्रमुख चन्दा इकट्ठा करता सावजनिक काय चलता जनोपयोगी योजनाएँ बनाता इलियट का नाम ्वन्दा देने वालों में प्रथम रहता । जिस किसी योजना में देश के रइंस व्यवस्थापक होते इलियट खुलने दाथों अपना सदयोग देते श्रौीर जिस योजना की प्रशंता नगर नगर में होती उसमें न्न्तियट अपना नाम अवश्य सम्मिलित करा लेते । पेरिस के दो सबसे कड़े सबसे श्रेष्ठ तर सबसे वैभव-पण क्लब के वे स्थायी मेम्बर थे | फ्रांस की फैशनेबिल खियाँ उन पर लड़ थीं। इलियट वास्तव में अपनी परी जवानी पर थे । फ़ांव के रंगीन समाज ने उन्हें अपने में सम्पूण रूप से घुला-मिज्ञा लिया था ।




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