टंडन निबन्धावलि | Tandon Nibandhavali

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सम्सलनका बूण नतत्व ठण्डनजाके हायाम रहा+ हिन्दी-पहित्य-सस्मेलतका सम्‌ १९२३ ई. का अधिवेशन ऋणपुर मे हुआ, क्म्सेलनक्के सदस्यों और हिन्दी- प्रेमिणेंत उसका सभापतित्व करने का अनुरोध ठण्डनजीसे किया । टण्डनजीको बह अनुरोध न चाहते हुए भी स्वीकार करता पडा। सम्मेलतके उस जधिवेशनके स्वागताध्यक्ष आचर्य महावीरधनादजी दिदवेदटी थे । इसके बाद तो मस्येलन की प्रत्येक सभा और समितियोंक्षी बेंठकर्मे रूइर्दीके विचार पथ-परदर्शत का काम करने थे। बिता टण्डनजीके कोई बैठक होती ही नहीं थी। | « इधर जब सम्सेलनका सवालन विशुखल हंसने लगा,ठो १९६२ में टण्डवजीके प्रयासोंके फलस्वरूप केस्रीय सरकारने एड झासन्निकाय बनाकर सम्मेलनकों राष्ट्रीय महत्व की संस्था घीधिद कर दिया। मिक्रायने उसके অন্গাললক্ষ লা निभ्रम बनाए हैं। रण्डनजी मवं चम्‌ १९२७ ई. में उत्तर प्रदेशकी विधान-सभाके संर्वंसम्मतिसे अध्यक्ष निर्तालित हुए थे और ३ नवम्बर १९३९ तक वे इय पदपर बने रहे। दुबारा पुत्र: जत्र सतः १६४७ ई. में देश आजाद हुआ तथा विधान-सभाके चुनाव सम्पन्त हुए, तो टण्डनजी इलाहाबाद से विघान- सभाके तदस्थ सिर्वालित हुए तथा उतको विधान-सभाका अध्यक्ष चुता गया। सभाके अध्यक्ष रहते हुए टण्डजीने अपना जो निष्पक्ष मत रखा और अध्यक्षके বা किया, वह দিভ अध्यक्षोंके लिए अनुकरणीय बना। १ श्प ९४९ ई. मे जच भारतीय परंविध्ान सधाकी वल्कं की सर्द, ततौ उनमे राष्ट्रभापाका प्रश्न अत्यन्त उलझा इन्ना प्रशत था। अँग्रेजी-परस्त एक , बहुत बड़ा बरयय हिन्दीकों राष्ट्रभाषाके रूपमें स्वीकार किए जानेके चिकद्ध প্রাঃ यहाँ तक कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी ' हिन्दुस्तानी ' के पक्षमें थे। यह वही ही विकेट स्थिति थी॥ ऐंसी विकट स्थिनिमं दण्डनजीन हिन्दीका सेतु त्ख किया और सर्व क्षम्भतिसे संक्षिक्षान-सभा दूदा हिन्दीको राष्ट्रभाषाके रूपमे स्वीकृति प्रदान कराई यंदि टण्डनजीने कहाँ हिन्दीका नेतृत्व न किया होता तो ऐसा होना कदापि सम्भव न होता । दण्डनजी अपने व्यक्तिगत जीवन बहुत ही संग्रभी, मितव्यवी तथा दूसरोके प्रति बड़े उदार रहे। उतकों समय-समयय्र आशिक संकटोंका सामता करना पड़ा, किन्तु उन्होंने इसकी चिता तनिक भी नहीं की। टण्डनजीकों (१३)




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