महायुद्ध | Mahayuddh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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5) ০০5, ८. ४-२८: কী ক महाष दयानन्द मथ कर अमृत निकाला तुमने, विष पी जग को प्राए दे गये । पत्थर फोड़ निकाली .गंगा, पाषाणों की नाव खे गये ॥ प्राये लाये साथ सव्य तुम, स्वप्न छोड सारा जग जागा। गूंज उठा आर्यत्व देश में, भय का भूत आग से भागा ॥ तुम बोले, जग ने स्वर पाया, भारत मका भाल उठ गया) जिसमें स्वयं जा फंसे थे हुम, वह्‌ भ्रनीति का जाल उठ गया | भंवर किनारा वना चरण छ, तैराकर संसार ले गये। मथ कर अमृत निकाला तुमने, विष पी जग को प्राण दे गये |। महापुरुप १७




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