सूत्र कृतांग सूत्र भाग - १ | Sutrakrtanga Prat I

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Sutrakrtanga Prat I by मधुकर - Madhukarश्रीचन्द सुराना 'सरस' - Srichand Surana Saras"

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श्रीचन्द सुराना 'सरस' - Shreechand Surana 'Saras'

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १६ ) प्रयास मैंने किया हैं, ताकि पाठक उन दोनों के अनुशीलन से स्वयं की बुद्धि-क्सौटी पर उस्ते कसकर निर्णय करे। गि एवं वृत्ति के विशिष्ट अर्थों को मूल संस्कृत के साथ हिन्दी में भी दिया गया है। जहाँ तक मेरा अध्ययन है, अब तक के विवेचनकर्ता संस्कृत को ही महत्व देकर चले हैं, चूणिगत तथा वृत्ति-गत पाठों को मूल रूप में अंकित करके ही इति करते रहे हैं, किन्तु इससे हिन्दी-पाठक के पल्‍ले कुछ नहीं पड़ता, जबकि आज का पाठक अधिकांशतः हिन्दी के माध्यम से ही जान पाता है। मैंने उन पाठों का हिन्दी अनुवाद भी प्रायशः देने का प्रयत्न किया है यह संभवतः नया प्रयास ही माना जयेगा | आगम पाठो से मिलते-जुलते अनेक पाट, णब्द बौद्ध ग्रन्थों में भी मिलते हैं जिनकी तुलना अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है, पाद-टिप्पण में स्थान-स्थान पर बौद्ध ग्रन्थों के वे स्थल देकर पाठकों को तुलनात्मक अध्ययन के लिए इंगित किया गया है, आशा है इससे प्रवुद्ध पाठक लाभाच्वित होंगे । अन्त में चार परिशिप्ट हैं, जिनमें गाथाओं की अकारादि सूची; तथा विशिष्ट शब्द सूची भौ है । इनके सहारे आगम गाथा व पाठों का अनुसंधान करना बहुत सरल हो जाता है । अनुसंधाताओं के लिए इस प्रकार की सूची बहुत उपयोगी होती है । पं० श्री विजय मुनि जी शास्त्री ने विद्वत्तापूर्ण भूमिका में भारतीय दर्शनों की पृष्ठभूमि पर सुन्दर प्रकाश डालकर पाठकों को अनुग्रहीत किया है ) इस संपादन में युवाचार्य श्री मधुकरजी महाराज का विद्वत्ता पूर्ण मार्ग-दर्शन बहुत बड़ा सम्बल बना हैं। साथ ही विश्व॒ूत विद्वान परम सौहादंशील पंडित श्री शोभाचच्द्रजी भारिल्‍ल का गंभीर-निरीक्षण-परीक्षण, पं० मुनि श्री नेमी चन्द्रजी महाराज का आत्मीय भावपूर्ण सहयोग--मुझे कृतकार्य बनाने में बहुत उपकारक रहा है, मैं विनय एवं कृतज्ञत्ता के साथ उन सबका आभार मानता हूँ और आशा करता हूँ श्र्‌ त-सेवा के इस महान कार्य में मुझे भविष्य में इसी प्रकार का सौभाग्य मिलता रहेगा । ३० जनवरी १६८२




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