विभूति | Vibhuti

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आचार्य शिवपूजन सहाय - Acharya Shiv Pujan Sahay

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रामलोचन शरण - Ramalochan Sharan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अस्तु | इस पुस्तक से पहले मेरी लिखी हुई ओर मेरे द्वारा सम्पादित होकर चार-पाँच पुस्तके--विहार का बिहार, हिन्दी द्रांस- খা, ৬৯ लेशन, प्रेमकली, जिवेणी, सेवाधमं, प्रेमपुष्पाक्षलि आदि--प्रकाशित हो चुकी हैं; पर उनसे कही अधिक मेरी ममता इसी पुस्तक पर है; क्योंकि इसमे मेरी उन आरम्सिक रचनाओं का सग्रह है, जिन्हे आज से कई वर्ष पहले मेने लिखा था ओर बड़े शौक से लिखा था। दसों आख्यायिकाएँ सच्ची घटनाओं के आधार पर दिखी गह शी | चारम्भ में जो तीन आख्यायिकाए हैं उनके लिये' “टाड साहब के राजस्थान इतिहास” से मसाला लिया था, ओर शेष सात जनशभ्रत घटनाओ के आधार पर रची गई थी | अतणएव आरम्भ की तीन तो ऐतिहासिक हैं ओर शेष सात सामाजिक। परन्ठु चौथी, नवीं ओर अन्तिम ( दसवीं ) आख्यायिका को मैने कानो-सुनी घटना के अनुरूप हो लिख मारा है। मालूम नहीं, उन्हें, कहातक स्वाभाविक या शिक्षाप्रद या मनो- रंजक बना सका हूँ | यद्यपि यह पुस्तक भेरी मोलिक रचना है, तथापि इसकी मोलिकता मेरी अपनी सम्पत्ति नहीं, सच पूछिये तो थोड़ा-बहुत अध्ययन और मनन करके मेने जो कुलु सीखा रै शओरोर मकरन्द -संम्रहकारिणी मधुमक्षिका की तरह जो कुछु सचय किया है, उसे ही, साहित्य-रसिकों के रसास्वादन--- मनोरञ्ञन--के लिये, इसर्मे रख दिया ३ ! 'रखने का ढक्क मान्न मेरा है। अब उसे आप मेरी मोलिकता कहिये या साहित्यिक डाका तक कह डालिये--आपको सब-कुछ कहते का अधिकार है । सदय खमालोचक महाशयों से मे कुछ भी कहने योग्य नहीं हैँ । विश्वास ई कि चे इसे आभ्यन्त पढ़ लेने के बाद अपना स्वतंत्र विचार प्रकट करेगे |




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