श्री रामचरितमानस | Shri Ramcharit Manas
श्रेणी : हिंदू - Hinduism

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutGoswami Tulsidas
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
28.9 MB
कुल पष्ठ :
971
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about गोस्वामी तुलसीदास - Goswami Tulsidas
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)रहमी -श्प्ति मात्र छर्थोत्तू निर्षिशिप- तय फिंफर ते रायरो शम दीं रहिदीं। येदि
ज्ञान-रवरूप दि । नाते नरवद सचु पददों या पिन परमपदहु
दुप दद्दिदा ॥” (पिन १४११--अयात, परम
पद (मोद्ष) में भी फिक्वरनभाव से ही रहूँगा ।
इसके थिना ( छुप्क शान फो फैघलय-मुक्ति )मेरे लिये दुःखद एवं दादक है, इत्यादि !
उपयुक्त प्रसद्लों से रपष्ट दो गया कि श्रीगोरवामी घी का भभीएट फेचलाईस-सिद्धान्तनहीं दै, किन्तु समन्यय ( विशिष्टादव ) सिद्धान्त दे ! ःसमन्वय सिद्धान्त में तर्दश्रय ( चित्-चित्त- ईश्वर ) की व्यवस्था दै, यया-ू
'सवौज्ीये सर्वेसंस्थे शदन्ते तामिन्दं सो म्यते पदक । प्रथगास्मान मे रितार व सत्सां
जुट्टस्ततस्तेनाइतत्वसेति ॥”” (श्वे० 11५)--अथोत्ू समस्त प्राणियों के जीवन के देतु-भूत,
सपकी स्थिति के पक मात्र आधार, पहुत ये न्रह्चक्र में इंस (इन्ति मच्छती ति हंस) न
जीच न्रमण करता रदता दै। अमणु करानियाल। ( प्रेरक » परमात्मा है और घ्रमण
करनेवाला मैं उप्तका शेष ( सेवक ) हैँ, शरीस्-भूत हूँ-इस प्रकार अपनेकी
दथकू मानकर जम शी ध्यान करता है, तब भगवान् की असन्नता से बह सुक्ति पाता
है। इसी भाव की मीौर भी श्रुतियाँ हैं; यया--“प्रधानत्तेत्रश्पति्गुशिरा: ।”
(रन इा५९ ) ; “सोका भोर्ग्य प्रेरितारं च मत्वा से प्रोक्त॑ श्रिविध॑ अहम चैतत्।”
(स्वेन ५11९ ) ; “संयुक्तमेतत्तारमच्षरं 'च॒व्यक्ताव्यक्त भरते विश्वमीशः “चार प्रधान-
अमताह्रं दर: ्रात्मानायीशते देव एक: ।” (इवे+ 1४-1० ) 1. इन झुतियों में रपट
रूप से चिद्चित् ( जीव और प्रकृति ) का प्रेरक ( स्वामी ) श्रद्द फद्दा गया दे 1शीनारद-पश्चराव मैं भगवान् ने श्रीयुय से तत््वन्रय के बल किये हैं. सीता में
भी इसी तरद के सम्बन्ध सदित तीनों तत्वों के चर्णन किये गये हैं ; यथा-“भूमि-
रापोघननो घायुः खें सनो घुद्धिरिच च । अददड्वार इती्यं मे भिन्ता कतिस्घा ॥ 'पपरेयमि-
तस्वन्यां प्रकृति विद्धि से परामू । जीवमूर्ता मद्दाबादों ययेदं॑'थायेते जगत, एतद्योनीनि
भूतानि सवोजीत्युपघारय । स्ू कूटरनरय लगतः प्रमवर प्लयस्तथा ॥”” हू रन कै |सच्वघ्रय का वैसा ही बर्सन श्रीगीरडामीजी ने भी किया दै, यदद इस श्रीरासच रितत
मानस के छनुबंघ 'घतुष्य से दी स्पष्ट दो जाता है. ।ब्सुबन्ध चतुष्टय(१) बिपय, (९) सम्दन्घ, (३) अधिकारी सौर (४१ प्रयोजन -थे
जद हैं ।
User Reviews
No Reviews | Add Yours...