नागरीप्रचारिणी पत्रिका - ५९ एसी. २६०७ | Nagriparcharni Patrika -59 Ac.2607

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Nagriparcharni Patrika -59 Ac.2607 by हजारीप्रसाद द्विवेदी - Hajariprasad Dwivedi

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हजारीप्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त 1907 - 19 मई 1979) हिन्दी निबन्धकार, आलोचक और उपन्यासकार थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 तदनुसार 19 अगस्त 1907 ई० को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'आरत दुबे का छपरा', ओझवलिया नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता पं॰ अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। द्विवेदी जी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी था।

द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई। उन्होंने 1920 में वसरियापुर के मिडिल स्कूल स

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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संस्कृत फोशों के शब्द-संकलन के धकार १६ है कि इन वेकल्पिक रूपों की झअप्रसिद्धि के कारण उस्े ये रूपज्ञात न रहे हों । हम स्वतंत्र लेख में इसका विधेचम करेंगे | इस प्रसंग में यह ज्ञान सेना चाहिए कि तारपाल के कोश में वेकल्पिक-शब्द-निर्दश अत्यधिक थे, जैसा कि सबोनंद द्वारा उद्धृत बचनों से सामान्यतः अनुमान होता है। वाचस्पत्य कोश में भी यह शेली बहुल मत्रा में दिखाई पड़ती है। यहाँ वेकल्पिक-शब्द-निर्वेश के कुछ उदाहरण प्रसंगतः दिए जाते हैं -- (क ) द्विविध-वेकल्पिक-रूप-निर्देश-“अथ नारायणो विष्ण॒रूध्वकर्मा नरायणःः ८ शब्दाणंव ); यषां नारायण शब्द के साथ श्प्मसिद्ध 'नरायण' शब्द का भी संकलन हे। इस कोश मे प्रथिवी का वैकर्पिक रूप 'प्रथवी' भी दिया है ( यद्यपि आजकल संस्कृत के विद्ान्‌ “नरायण” और 'प्ृथबी' को अशुद्ध ही समभते हैं )। इस प्रकार के वैकल्पिक रूपों के उदाहरण प्रचुर है; यथा जटा, (जरि, ( द्विरूप कोश ); हर, 'हीर' ( 'पंसारावत” ); ऋषि, 'रिपि' इत्यादि । इन वैकल्पिक रूपों का स्वतंत्र रूप से अ्रध्ययन अपेक्षित हे ।* (ख्र ) त्रिविध-बेकल्पिक-रूप-निर्देश--संस्क्ृत में ऐसे शब्द बहुत कम ही हैं जिनके तीन-तीन रूप होते हें। बाचस्पति कोश में इसका प्रसिद्ध उदाहरण दे “सकिज्ञ' शब्द्‌ । वहाँ इसके तीन रूप पयित टै--सरिल, सलिर, सलिल । 'हलादल!' शब्द्‌ इसका दूसरा उदाहरण दै । द्विरूप कोश ঈ का गया ईै-- दालाहलं हालहलम्‌ वदन्त्यपि दलादलप' | প্রি कोश में 'एड्ूक' शब्द के भी तीन रूप हैं--'भवेदेडोक- मेडकमेडुक च! । चार रूप वाले शब्द ( तद्धित-प्रत्ययांत शब्दों को छोड़ कर ), शायद संस्कृत में नहीं हैं अतः उनके संकलन का प्रसंग ही नहीं उठता । १०--विचरणात्मक शब्द्-संकलन-यथपि कोश साधारणतया शब्द-संप्रह के साथ-साथ अर्थ-निर्देश करके ही निवृत्त द्वो जाता हे, पर कुछ ऐसे भी कोश हैं. जिनमें ७---द्रिविध वैकल्पिक रूपों में उन शब्दों की भी गणना द्ोनी चाहिए जिनमें केवल हृस्व-दीधं-मेद होता हे । संस्कृत मे एसे शब्द बहुत हैं, और उत्कृष्ट कोश्यों में ऐशे वैकल्पिक रूपों का भी संकलन किया गया है, यथा--“वीनिः पम्क्ति! महि! केलि: इस्याद्रा हृस्वदी धंयो:? ( वाचस्पेति कोश ) । ८--स्कृत कोशो में शकुटि झब्द के तीन और रूपों का संकलन है--अ्रकुटि, शरुकुटि, भूकरि ।




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