स्वतंत्रता की और | Svanttrata Ki Aour Ac 4382 (1948)

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Svanttrata Ki Aour Ac 4382 (1948) by हरिभाऊ उपाध्याय - Haribhau Upadhyay

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हरिभाऊ उपाध्याय का जन्म मध्य प्रदेश के उज्जैन के भवरासा में सन १८९२ ई० में हुआ।

विश्वविद्यालयीन शिक्षा अन्यतम न होते हुए भी साहित्यसर्जना की प्रतिभा जन्मजात थी और इनके सार्वजनिक जीवन का आरंभ "औदुंबर" मासिक पत्र के प्रकाशन के माध्यम से साहित्यसेवा द्वारा ही हुआ। सन्‌ १९११ में पढ़ाई के साथ इन्होंने इस पत्र का संपादन भी किया। सन्‌ १९१५ में वे पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी के संपर्क में आए और "सरस्वती' में काम किया। इसके बाद श्री गणेशशंकर विद्यार्थी के "प्रताप", "हिंदी नवजीवन", "प्रभा", आदि के संपादन में योगदान किया। सन्‌ १९२२ में स्वयं "मालव मयूर" नामक पत्र प्रकाशित करने की योजना बनाई किंतु पत्र अध

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जीवन का उद्देश्य ‰ २: जीवन का उदश्य जीव कहांसे जन्मता है ओर कहां जाता है ? रास्ते में वह क्या देखता है,क्या पाता है वा क्या छोड़ता,क्या करता है-इन सबको जानना जीवन के रहस्य को सममना है। किन्तु इनकी बहुत गहराई में पैठना तक॑- शास्त्र और दर्शन-शास्त्र के सूचम विवेचन में प्रवेश करना है । उससे भरसक बचते हुए फिलहाल हमारे लिए इतना ही जान लेगा काफी दे कि विचारकों और अमुभवियों ने इस सम्बस्ध में क्या कहा है और क्या बताया है । उनका कहना हैं कि इस संसार में अमगिनत, शिर्म- भिन्न, परस्पर-विरोधी श्रौर विचित्र चीजें । किन्तु उन सबके अल्द्र हम एक देनी चीज को परते रै, जो सबने संदा समायी रहती है । उसका नाम उन्होनि भ्रात्मा रक्वा है । यह आत्मा हम भिन्नता श्रौर विरोध के अन्दर एकता रखता हैं। इस दिखती हुई अनेकतः मे वास्तविक एकता का श्रनुभव अस्मा के ही कारण होला है । सांप इतना जहरीला जीब है, फिर भी उसके मारे जाने पर हमारे मन मे क्यों दुःख होता दे ? शत्र, के भी दुःख पर हमारे मन में क्यों सद्दानुभूति पैदा होती है ? इसका यदी कारश है कि हमारे श्रौर उसके अन्दर एक ही तत्व भरा इभा है, जो खुख-दुःख ,हर्ष-शोक दि भावों को, परस्पर विपरीत शरीरों में रहते इए भी, एक-सा अनुभव करता है । उसी तस्व का नाम आत्मा है । जब यह सत्य किसी एक शरीर के न्द्र श्राया हुआ होता है, तब उसे जीवात्मा कहते हैं । जब जीवात्मा को यह शान हो जाता दे कि में बास्तव में मद्दानू आत्मा हूँ, किन्तु कारण-वश इस शरीर में आ रला हूँ--इसमें बंध गया हूँ और जब वह इसके बन्धन से छूटकर या इससे ऊपर उठकर झापने महान आत्मत्व को अनुभव करता है, उसमें मिल जाता है,तब वह परमात्मा हो जाता है, या यों कहिए कि मुक्त हो जाता है, सब तरह से स्वतंत्र हो जाता है । इसका सार यह निकला कि परतंत्रता में फँसा हुआ जीव स्वतंत्रता चाहता दे । गर्भ में आते ही स्वतंत्र होने का जह श्रयत्न करता हे । स्वतंत्रता उसके जीवन का प्रयत्न ही नहीं, ध्येय ही नही, बदिक स्वभाव-धमं हे । क्योकि जीव अपनी मूख दशा में स्वतंत्र दे । उसी दशा में बह झाःमा है । स्वतंत्र जीन का नाम परमात्मा है और परत॑त्र श्रात्सा का नास जीव हे । इस कारण स्वतंत्रता ज़ींब की प्राकृतिक या वास्तविक दशा है--परतंत्रत। अस्वाभाविक और




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