तरंगित ह्रदय अथवा विचार तरंगमाला | Tarangit Hriday Athwa Vichar Tarangmala

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Book Image : तरंगित ह्रदय अथवा विचार तरंगमाला  - Tarangit Hriday Athwa Vichar Tarangmala
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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द लसस्कारसिचपय नप्रस्कार कर्तेके श्रोर कुद कव्य ही नही र्हा । कक छतुम्हारे खिवाय इस डुनिशमें शोर कोई लमस्करण्य नहीं है। यह में जान गया हूँ । सेरा सिर संसारमें जहाँ कहीं सुकरता है वहां तुम्हारा पवि प्रकाश पाकर ही शकता है। जहाँ तुम्हारा प्रकाश नहीं है वहाँ यदि कोई बलानकास्ते शी भेरा सिर छुकाना चाहना है--उंडेके जोरसे अुकानः चाहता है, बन्दुकोौ शौर तोपौका भय दिललाकर युकाना चाहता है तब भी नही सकता । मालूम पड़ता है कि मेरा सिर टूट जायगा पर झुकेगा नही । किन्तु कही पर यदि तेरा कुछ भी प्रकाश दीख जाता है तो न जाने किस जादूसे मेरी इसी गदनमें वह लचक प्रकर होती हे कि तुरन्त तेरे प्रकार रूप वर्णों मेरा सिर जा पड़ता है ।ऐसा मालूम होता है कि मेरे खिरका यह खामाबिक घर्म है छोर तुम्हारे अकाशें मेरे सरतक के लिये कोई स्वाभाविक चु- स्वक शक्ति है जिस के कारण खिर दिना नमे रह हीनहीं सकता ।इख भ्रकारके सतत अजुभवसे मैंने यह जाना है कि तुम्दारे सिवाय खंसाप्में छोर कोई नमस्करणीय नहीं है ।(| (|में यह भो जान गया हूँ कि इस विश्वके सबझे सब नम- स्कारोके एक मात्र भाजन मी तुम्हीं दो! खच्वे दिलसे जो कोई भी नमस्कार जिस किीके भी प्रति किया जाता हे दे




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