यथासम्भव | Yathasambhav

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Book Image : यथासम्भव - Yathasambhav

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about शरद जोशी - Sharad Joshi

Add Infomation AboutSharad Joshi

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
के अतिरिक्त वह्‌ करता क्या है ? वह पूरे समय नवदौलतियों के लिए अतिरिक्त कमाई की साधन-सुविधा उत्पन्न करने का आन्दोलन चलाता है । वह्‌ : ऐसी समस्या उत्पन्न करता है जिनके कारण कोई रुपया विना म्लोलियों के माफ़ंत ग्रीवो तक नहीं पहुंच पाता । सारे काले धन्धों को स्थानीय नेत्ता का अभयहस्त मिलता है। लोग इसका कारण नहीं समझ पाते कि उनका नेता ऐसा क्यों करता है। जितने छलछिद्र हैं, सामाजिक और आधिक जीवन में अनेतिकताएँ हैं, श्वेत वस्त्रधारी नेता उनमें कहीं उलज्ञा हुआ है । इस दश्चक की नैतिक परगति तो यह है कि अनैतिक काण्डं का नायक या खलनायक भी प्रायः नेता ही होता है । नव- दौलतिया संस्कृति के सारे कुकर्मों से यह व्यक्ति जुड़ा हुआ है । भैंस और बगुले की दोस्ती का ताज्जुब कवीरदासजी को भी था--भेसन्हि माँहू रहत नित बकुला, तकुला ताकि न लीन्हा हो । गाइन्ह माँह बसेउ नहि कवहू, कैसे के पद पहिचनवहू हो ।' उनका अर्थ था कि यह जीवरूपी बगुला, यह मन, दिन-रात इत्द्रिय-रूपी भेंसों में रमा रहता है । गायों अर्थात्‌ संतों की तरफ़ इसकी दृष्टि कभी' नहीं जाती । परम पद पाने की यह जाने क्यों नहीं सोचता ? जहाँ तक राजनीति का सवाल है, परम पद तो प्राय: बगुलों को ही प्राप्त होते हैं । जो ऊपर से जितने सफ़ेद और अन्दर से जितने घाघ और स्वार्थी. होते हैं, राजनीति में उन्हें सर्वाधिक सफलता प्राप्त होती है । भेसें बगुलों को अपनी पीठ पर विठा लेती हैं । काले और असामाजिके धन्धो के कीचड़मे फंसे लोग नेता को अतिरिक्त आदर देते हैँ ओर नेता भी उनके विना रह नहीं पाता । जीव इन्द्रियो मे रमा रहता है । कवीरदासजी ने शरीर को चमड़े का गाँव कहा है। राजनीति में भी कम लतिहाव नहीं है । इंच भर गहरी संवेदना नहीं होती पर मगर के आँसू ज़ोर-शोर से ब्रॉडकास्ट किये जाते हैं । जो कुछ हैं सब ऊपरी । फिर चाहे शिक्षा पर जोर हो या गरीबों की फ़िक्र। सारे नारे और सिद्धान्त अपने मेके लिए रगड़े जाते हैं । साधारण नागरिक आश्चर्य करते हैं कि कवीर की तरह ये सफ़ेद बगुले गायों की तरफ़ आकर्षित क्यो नहीं होते ? एक राजनेता उन ईमानदार, मेहनती, संघषंशील शक्तियों से अपने को क्यों नहीं जोड़ता ? पवित्रता से उसे क्यो एलर्जी है ? वह क्यों भ्रष्ट, निठल्ले, कामचोरो, मृप्तखोरो मे रमा रहता है ? वह्‌ क्यो सारे दुष्कर्मों के केन्द्र में है ? इसका उत्तर किसी के पास नहीं कि वगते भेसो की तरफ़ क्यों आकर्षित होते हैं? नेता क्यों समस्त हीन प्रवृत्तियों का सूत्रवारहो जाता है । प्रजातन्त्र की सबसे वड़ी ट्रेजेडी यह है कि सामान्य जन मन ही मन नेताओं से नफ़ररत करने लगा । इस सामूहिक भाव को उत्पन्न करने मेसारी पार्टियों का योग रहा है। केवल कांग्रेस को श्रेय देना दूसरों के साथ अन्याय है । जो नेता वेईमान नहीं हैं वे भी पाखंडी तो कम-से-कम रहे हैं। जो चरित्र से पवित्र कहलाते रहे, पद-लोलुपता तो उनमें भी कम नहीं रही ।1अब एक दुर्गुण और भेंसन्हि माँह रहत नित वकुला / 17




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now