व्यक्ति और राज | Vyakti Aur Raj

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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व्यक्ति और राजसभ्य, सभा प्रकारके मनुष्योंमें पायी जाती है ।जो नियम इतना व्यापक है उसका कोई न कोई व्यापक 'आधार भी होगा, जिसकी जड़ मनुष्यकी प्रकृति और उसके जीवनकी 'आाचश्यक परिस्थितियोंमें होगी । सजुष्यके सस्वन्धमें देमा कषा जाता हैफि वह एकाकी रद नहीं सकता । इसका अर्थं यद्द है कि एका की रहनेसे मनुष्यका जीवन पूणं रहता हैं. उसकी बुद्धिका, उसकी छिपी मानस शक्तियोंका, विकास 'यकेलेमें नहीं हो सकता । राग, ढ प, दया, देप्या, स्पर्धा, क्रोध, स्याग, ममता, अपना, पराया, यद सब भाव एकान्तमें उदय सदी हो सकते और इनके उद्य हुए बिना चरित्र खिलता नहीं । भावों के संघषसे दो मदुष्य उन्नति करता है । जहां कई मनुष्य हमे वदी समाज होगा ओर जहा समाज होगा वहीं नियंत्रण दोगा । नियंत्रण ही राजहा सूक्ष है। जो दिपथयामी दोगा, 'अथात जो समाजें प्रचलित दृश्तूरोंके विरुद्ध छाचरण करेगा या करना चाहेगा, उसको दरड देना दोगा, रोकना होगा। दो कग- डनेदालॉगिं कमी-कभी निणुंय भी करना होगा । यदि सब लोग पूर्णतया मनमाने रददने लगें तो सात्स्यन्यायम समाज नप्ट हो जाय और सबकी उन्नति, जो साथ रद कर हो दो सकती है, चन्द हो जाय । इसी प्रकार कभी-कमो दो समाजो, मुक्तौ दो टुकड़ियोंगें, मछली मारनेकी जगह, साय, भेड़, चकरी, चराने की जगह, उबेरा भूमि इ्यादिके लिये बिवाद हो सकता है । यह चिवाद या तो वात-ीतसे तय दोगा या लड़कर। दोनों




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