पंडित चैनसुखदास न्यायतीर्थ स्मृति ग्रन्थ भाग १ | Pandit Chainsukhdas Nyayatirtha Smriti Granth Khand - I

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पण्डित साइब के निधन के समाचार से हृदय को बडा आधात पहु चा ।उनके निधन से समाज और देश की अपार क्षति हुई । „ श्रक्षयकुसार जन सम्पादक- नवभारत टाइस्समेरे लिए पडित जी आत्मीय थे। बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व पहली बार उनसे भेट हुई थी हब से जब-जब जयपुर जाना हुआ उनसे बरावर मिलता रहा । नाना समस्याओ पर उनसे विचार सुनकर प्रसन्नता होती । अपने मत के प्रति उनका आग्रह नही रहता था । उदार चिन्तन उनकी ऐसी विशेषता थी जो हमेशा के लिए मेरे मन पर छाप छोड गई है । धर्म के मूल सिद्धातो के वे पुजारी थे और हृढता पूर्वक वे उनका पालन करते थे । वे सिद्धान्त सभी धर्मौ मे समान है । शास्त्रो से उनकी अपार गति थी । “'अहेत प्रवचन' जैसा उत्तम सकलन उनके अगाध पाडित्य और सूक्ष्म ज्ञान का प्रतीक है । उनका व्यक्तिगत जीवन एक सत का जीवन था । पण्डित जी तो साधु, सर्वेजन श्रद्ध य थे ही उनको तो अपने सुकृतो के फलस्वरूप भगवद्धाम प्राप्त होगा ही उनके लिए हमे शोकं भौर प्रार्थना करने की आवश्यकता नही । ज्ञानी सन्त तो जीवन मृक्त होते ही है, ्रो° रासर्सिह तोमर श्रध्यक्ष, हिन्दी विभाग, विश्व भारतीपंडित जी अत्यन्त सरल स्वभावी, मिलनसार, व्यवहार कुशल, स्पष्ट चक्ता.थे । जेन समाज को आपके वियोग से महान क्षति हुई है. जिसकी पूर्ति हये ही नही सकती । परसादीलाल पाटनी कर दिल्लीआप सुधारक एवं मीमांसक विद्वान्‌ थे । लेखक, पत्रकार, कर्मठ कार्य- कर्ता, सस्था सचालक आदि विभिन्न रूपो मे आपके उशन होते थे । सिद्धातवादी थे, सिद्धात के समक्ष वे किसी की नही चलने देते थे, ढोग, आडम्बर एव पाखडो की खूब पोल खोलते थे ! आप समाज मान्य ही नही ये अपितु राज्य मान्य भी ये । स्वभाव के मृदुल, भद्र, सरल एव उदारये । अनेक सस्थाभो के सस्थापक, सचालक, पोषक एव मूक सेवक थे ।आपका हृदय, उदार विशाल एवं गम्भीर था । विद्वानों के प्रति सतत सम्मान की भावना रखते ये ।ज्लानचन्द्र जेन (स्वतन्त्रवीरवाणी के लब्ध प्रतिष्ठ, सुयोग्य सम्पादक जैन समाज से चल बसे ।यह्‌ कषति साहित्य ससारके लिए पूणं होनी कठिन है। पण्डित जी प्राचीन




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