महामना मालवीयजी | Mahamana Malaviyaji

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutSitaram Chaturvedi
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8 MB
कुल पष्ठ :
217
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है |आप कमेन्ट में श्रेणी सुझा सकते हैं |
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about सीताराम चतुर्वेदी - Sitaram Chaturvedi
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श महामना माख्वीयजी +£चिधाका कुछ धन उन्हेंनि ननिदालसे भी पाया
पवी भथा। चोवीसर पच्चीख चप॑की नई जवानीमे दी वेस्यास् चन गप और भागवती कथा फदनी प्रारम्भपरम मागवत पण्डित प्ेमधर चतुर्वेदी पुत्र पण्डितं ब्रननाय
ग्यासजी । माल्वीयजी ईन्दीके सीसरे पत्र ये ।
की ) छडील खुन्दर देहके साथ-साथ उन्हें मघुर
कण्ठ भी मिला था। जव योलते थे तो मानो मिश्री
घोलते थे। पक तो मीठी योती भौर फिर चज
भाषा-फोयल भर घसन्त-चस खुननेवाले रद
हो जाते थे । रीवाँ, दर्भज्ञा और काङीके महदा-
राज्ञार्भोनि उनका बढ़ा सम्मान किया । कितने ही
रजन्नयाई इन्दें गुरु मान चुके थे बे वंशी घजाकर
जय गाते थे--
गावो मधुरा गोफ भुरा य्टि्मधुरा खषटिम॑धुरा ।
दरिति मधुरं कलित मधुर मधुराधिपतेरखिलं मधुर ॥
हृद्य मुर गमन मधुर दचन मधुर चिद मधुर ।
चसिर्ते मधुर चकित मधु प्रमित मधुरं दिति पुर ॥
भधर सपुरं यदनं मधुरं नयनं भुर वघ्नं मधुरं ।
हसितं पुरं कलितं मधुरं मधुराधिपतेरदिरं मधुरं ५
ते मधुका खद सोता बद्व या क धरोवा-
दे(९
गण मन्वमुख्ध होकर नाच उठते थे। उनकी कथा
भावमय होती थी--कमी रखते ये कभी सेते ये-
कभी चेश थासो कमी शान्ति थी! जाने पदता` था किं नाट्य-शाखरके सारे रस परिडत श्जनाथ
| व्यासजीके रुपमें साकार होकर चिराजमान हैं । नये-डर नये इटान्तेसि सजाकर शान्त, गम्भीर, सन्मय भावसे
| जब वे भगवानकी कथाफा रस याँठते थे उसकाघर्णन कौन कर सकता है--गिया यनयन, नयन-# चिनु यानी।पे मीटातो बोलते षी ये, पर सन्तोषी भी पूरे
ये। उन्दने कभी किसके मागे हाय नदी फैलाया ।
जो कुछ कथापर चढ़ गया उसे तो स्वीकार कर
लिया, पर किसीसे दान नहीं लिया। सदुभाषिताने
क्रोघको ओर खन्तोषने लोभको उनके पासं फटकने
न दिया और ्सोल्िये इतने यदे परिवास्को केकर
भी चे सुखी रहे । थे पण्डितप्झ ढज्ञका कठीदार
अज्ञा पहनते और सौगोदिया सोपी या पगढ़ी
सिय्पर रखते थे। गलेमें दुपट्टा पड़ा रदता, जिसपर
जाके दिनम एक दुला दार सिया करते थे।` याद्वरसे भानेपर बे घासे कपे उतारकर एक ओरश्स्र दिया करते थे । पक चार ऐसा हुआ कि थे
पाठ फर रदे थे । अदानक पक अंग्रेज उधरसे आ
निकला ओर उसने इनसे कठ पश्च किया ! ये मौन
भावसे पाठ करते रहें, उसका कुछ उत्तर न दिया।
इसपर उसने न्द यतसे छू दिया । पे तत्काल धरः
चापस साद ओर गोवर भलकर खथैल स्मान
करके फिर पश्चगव्य, पश्चासतं झदण करके उन्हें ने
अपनी शुद्धि की । इतने नेमके पके ये परिडित
अजनाथजी 1
सौमाग्यकी यर्पा जब होने लगती है तो घद
' मरपूर होती दे । पण्डित' घ्रजनाथ व्यासजींका
विवाद सदजादपुरमं छमा 1. सौभाग्यसे - इनकी
धर्मपल्ली श्रीमती मूनादेवीजी «यड़ी +सर्ख समीर
कोमल षदयर्वाठी मिलीं । “अड़ोल-पहोलकी जो
सेवा चन पड़े कर देना और संघसे प्रेमसे योलकर'
यशी दौन्तिसे घरे घर-भरका कपे देखना यदी
उनका काम था । वे किसी को दुली वेदी
User Reviews
No Reviews | Add Yours...