जीवनसाहित्य | Jeewan-Sahitya

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Jeewan-Sahitya  by आचार्य काका कालेलकर - Aachary Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१० -कौकम सहित्य दुणुःखका कलेवर भक्ते ही सुन्दर हो, श्चुसकी पोशाक भले ही , अरविश्ित हो, श्युतमे भरसे बह कम घातक स्मबित नहीं होता; बल्कि वह ज्यादा खतरनाक हो जाता है । - श्रपनी समाज-न्यवस्थाकी सुन्दरताका हम चाहे जिना बखान करे', मगर अुसमें अराज श्रक तुटि स्पष्ट व देती है। अेक जमाना था जब हम सब संस्कृतमें ही लिखते थे । . छिसलिये हमारे प्रौड घौर ललित विचार सामान्य समाजके लिये दुष्माप्य ये । लेकिन श्रुस वक्त संत-कवि 'और कथा-कीतेन- कार वह्‌ सारा कीमती माल श्रपनी शक्ति के श्रनुसार स्वभाषाकी फुटकर दुकानोंमें सस्ते दाम बेचते थे । मुगल-कालमें अुदू की प्रतिष्ठा बढ़ी और श्ररवी, फारसी भाषाश्रसे कविवोँको प्रेरणा भिलने लगी । 'ंप्रेजी जमाना शुरू हुआ और अपनी सारी मानसिक खराक शरंभजीसे लेनेकी हमें श्रादत पड़ गयी । श्चुसका अच्छा ओौर बुरा दोनों तरहका असर हमारी मनोरचनापर पड़ा है; साहित्यपर तो पड़ा दी है । ्राजकलके हमारे अखबार श्नौर मासिकपत्रिकाओं नये जमानेके विचार फुटकर भावसे बेचनेका काम करने लगी हैं । लेकिन झिन तीनों. युगोंमें गरीब श्रेखीके ललोगोंकि लिये, देहातियों और मजदूरोंके लिये, स्त्रियों और बालकों- के लिये विशेष प्रयास नहीं हुआ है। शिक्षित समाजमें भी झुनका सामाजिक प्राण बहुत कुछ साहित्यका निर्माण करता है । हमारे संस्कारी देशमें साघुसन्तोंकी कृपासे भ्रुसमें कुछ बृद्धि . इ्ची हो तो भिससे आश्चयोन्वित होनेका कोश्ची कारण नहीं । लेकिन ज्यादातर मध्यम भणी ही बिचार हम हमेशा करते आये हैं । हम यह भूल गये हँ कि गरीव लोगोंका जोवन सन्तेष- मय, भागामय आर संस्कारमय करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है।-कुछं छिनीगिनी कददानियोंक़ो छोड़ दें तो हमारी कहानियों भौर श्ुपन्यासोंमें गरीबोंके करूप 'काव्यमय जीवनका विचार




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