चौथा कर्मग्रन्थ | Choutha Karmgranth

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Book Image : चौथा कर्मग्रन्थ - Choutha Karmgranth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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३ ] यदद पुस्तक छिखकर तो बहुत दिनोसे तैयार थी, पर छपेसरानेकी सुविधा ठीक न होनेसे इसे प्रकाशित करनेमें इतना विरम्ब हुआ । जल्दी श्रकादित करनेके डरादेसे वम्बई, पूना, आगरा कर फानपुरमे स्रास तजवीज़ की गईं । बढ़ा सच उठानेके याद भी उक्त स्थानें छपाइका ठीक मेल न येठा, शभन्तमें काशीमें छपाना निश्चित हुआ । इसछिये प० सुखलाछजी गुजरातसे अपने सहदायकोंकें साथ काशी गये श्लौर चार महीन ठरे । फिर भी पुस्तक पूरी न छपी और तबी- यत विगड़नके कारण उनको रुजरातमे वापिख जाना पड़ा । छऊपका पाम काक्षीमे ओर पं० सुखलानरूजी दार मील-जितनी दूरीपर, इसलिये पुस्तक पूर्ण न छपनेमें वहुत अधिक विछम्व हुआ, जो क्षम्य दे । उपर जिस मद्दका उदेख किया गया है, उसको देखकर पाठकों- के टिलम प्रश्न हो सकता है कि इतनी मदद मिछनेपर भी पुस्तकका मूल्य इतना क्यों रक्‍्खा गया ? इसका सच्चा समाधान करना आव- चयक है । मण्डलका उद्देयय यद्द हे कि जहां तक हो सके कम मूल्यमे हिंदी मापामे जन धार्मिक प्रन्थ सुढुभ कर दिय जायें । ऐसा उद्देश्य होनेपर भी, मण्डल ढेखक पण्डितांस कभी एसी जल्दी नहीं कराता, जिसमें ज्दीके कारण लेखक अपने इच्छाघुसार पुस्तकको न लिख सके । मण्डछका लेखक पण्टितोंपर पूरा भरोसा है कि वे खुद अपने शोकस लेखनकायेका करते है; इसलिये वे न तो समय ही बृथा भिता सकत हैं ओर न सपनी जानिघस लिखनेम का कसर हो छठा रखत हैं। झमीतक उखनकायेमें मण्डल और लेखक का व्यापारिक सम्बन्ध न होकर साहित्यसवाका नाता रद्दा दे, इसलिये यथेष्ट वाचन, मनन रादि करनमें रेखक स्वतन्त्र रहते हैं। यद्दी कारण दें कि पुस्तक सैयार दोनेंमें अन्य सस्याओंकी छपक्षा अधिक विरम्य होता है ।




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