मातृवाणी | Matr Vani

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Matr Vani by आचार्य अभयदेव विद्यालकार - Achary Abhaydev Vidyalakarमदनगोपाल - Madangopal

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मदनगोपाल - Madangopal

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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© यह जगत्‌ एक गडबड़झाछा है, जिसमें अंधकार और प्रकाश, मिथ्या ओर सत्य, खल्यु ओर जीवन, ऊरूपता ओर सोँद्यै, घणा ओर प्रेम इतने पास-पास लिपट गये हैं कि इनको अलग-अलग समझना प्रायः असंभव द, इससे भी अधिक असंभव है इनको जुदा कर देना और इस सक्छेपका--जो एक निदैय संघ्ष॑की चिभीषिकाको चयि इए है--अत करं देना । यह संघष ओर भी भीषण इसलिये हो जाता है कि यह परदेकी आदे छिपा हुआ हे, विरोषतः मानव-चेतनामे जहां यह सधा ्ञानके स्यि, शक्तिके खयि, दिजयके लिये होनेवाली तीन मनोवेदनाके रूपमें परिवतित हो जाता है । यह एक युद्ध है जो अज्ञानभरा और दुः्खदायी है, यह और भी अधिक भीपण हो जाता है क्योंकि इसका ओर-छोर ही. कहीं नजर नहीं भाता, किंतु इसका खातमा हो सकता है इंद्रियों, मात्ना- स्पर्शा और भावनाओंके, अर्थात्‌ मनके कषेत्रसे परेकी भूमिकामे--भाग- चत चेतनामें पहुंचकर । => ९३




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