काव्य के रूप | Kavya Ke Roop

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
12 MB
कुल पष्ठ :
270
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)दृश्य काध्य--विवेचनका होता है ( इनकी व्याख्या आगे की गई है )। यह अवध्था शारी
रिक्र आर सानसिक दोनों ही प्रकार की होतो है । मानसिक अबस्था
का सीधा तो अनु करण नहीं होता है क्रिन्तु अनुभावों ओर सात्विक
भावों द्वारा सानसिक भावों का द्योत्न हो जाता है ।नाव्य, नृत्त और नृत्य से आगे की बस्त है। नृत्त में ताल-लय-
आश्रित पद-सञ्म्चालनादि क्रियाएँ रहती दै-- चृत्तं ताललयाशध्रमम् |
नृत्य में भाव-प्रद्शन भी रहता दै-'भावाश्रय॑ नृत्यम'। नृत्य और
नास्य में यदद् मेद् करिया गया टै किं नृत्य केवल भावाश्रित है, नाख्य रसा-
গিন ই | नाख्य में चारों प्रकार के अभिनय होने के कारण उसके द्वारा
सांमाजिकों में रस का सञ्चार हो जाता है। इस अभिनय की प्रधा-
नता के कारण दृश्य काव्य श्रव्य से भिन्न हो जादा है। नाटक रूपक
का एक. प्रकार दही नहीं वरन् बह जातिवाचक शब्द बन गया
है | उसका व्युत्यत्ति का अर्थ भी वही ई जो रूपक का है। नट अर्थात्
अभिनेता से सम्बन्ध रखने के कारण नाटक नाटक कहलाता हैं ।
बविकासबाद का एक सिद्धान्त है कि जाति के इतिहास कोह्यक्ति के
जीवन में पुनराबृत्ति होती है। यदि हम यह जानना चाह कि किसी
` संस्था का प्रारम्भ कैसे हुआ तो हमको बच्च्चों के
नाटक की मूलभूत जीवन में उसके बीज और अंकुरों को देखना
मानसिक प्रवृत्तियाँ. चाहिए | बच्चों के जीवन में मानव-समभ्यता का
इतिहास सजीव अक्षरों में अंकित र । मनुष्य
की स्वाभाविक अनुकरणशीलता का पता हमको बालकों के खेल में
मिलता है ।
बच्चा अपनी कल्पना के बल लकड़ो के डंडे को घोड़े का आकार
देकर उसको सरपट चाल चलाता है.। कहीं वह स्त्रयं ही इंजन वन्कर
भक-भक करता हुआ अपने पीछे समव्यस्क बच्चों की रेल को भगाता
किरता है। मू छों के रेखामात्र चिह्न न होते हुए भी वालक अपने बड़ों
के अनुकरण में स्याही की यूं छ बना लेता है । बालिकाएँ घरुआ-पतुआ
बनाकर उसमें गुड़ियों-गुझ़ों का विवाह कराकर अपने भावरी गाहस्थ्य
जोवन का पंशगों आनन्द अनुभव कर लेती हू। यहां नाटक को भूल
प्रवृत्ति है ।१६
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