काव्य कल्पद्रुम | Kavya Kalpdrum

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Kavya Kalpdrum  by कन्हैयालाल पोद्दार - Kanhaiyalal Poddar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ए ) श्रत्यन्त अनुरक्त-है। किन्तु निद्रा के वशीभूत होकर आपने उसको स्वीकार (डसका सत्कार) नहीं किया अतः आपको निद्रासक्त (श्तेषाथ-- अन्य नायिकासक्त) देखकर चह अ्रत्यन्त विकल होगईं, यहाँ तक कि आप में उसका जो अनन्य प्रेम था उसकी उपेक्षा करके वह खण्डिता- नायिका की तरह रुष्ट होकर आपके निकट से चली गईं थी--पर आपके वियोग की व्यथा उससे न सही गई, अ्तएव इस वियोग- च्यथा को दूर करने के लिये आपकी सुख-कान्ति का कुछ साइश्य चन्द्रमा में देख कर वह चन्द्रमा को देख-देख कर ही अपना सन श्रव तक बहला रही थी। किन्तु चन्द्रमा भी इस समय प्रभात होने पर आपके मुख के साइश्य को छोडकर पश्चिम दिशा को जा रहा है। तएव श्रव आपके साचश्य-दर्शन का सनोविनोद भी उसके लिये अदृश्य होगया है--- वह निराभश्चित होगई है । कृपया अब निद्रा को त्यागकर उस श्रनन्य- शरणा लक्ष्मी को सत्फार पूवक स्वीकार करियेगा | यहाँ राजा अज में नायक के, लक्ष्मी मे राजा की मियतमा के ओर निद्वा में राजा की अन्यतसम नायिका के, आरोप मे रूपक अलड्भार है। यह रूपक, पातःकालीन निस्तेज-चन्द्रमा के भंग्यन्तर से चर्णन किये जने मे जो पर्यायोक्तिः च्रलङ्कार ३, उसका ङ्ग ३ । ( ४ ) भ्रभातकालीनं द्श्य पर महाकचि श्री हषं का एक्‌ उक्ति- वेचिज्य देखिये--- वरुणगरहिणीमाशामासादयन्तममं रुची- निचयसिचयांशांशश्र 'शक्रमेण निरंश॒कम्‌ । तहिनमहसं पश्यन्तीव प्रसादसिषादसौ, निजसुखमितःस्मेरं धत्तं हरेर्महिषी दरित्‌।' --नेपधीयचरित १६।३ । किनि «>> लत अप- लक. # अपने नायक को अन्य नायिकासक्त जान कर जो कामिनं হত হী जाती है उसे खणिडिता नायिका कहते हैं ।




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