आदर्श वाणी | Adarsh Vani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(३) $ | कम निजंरा का साधन भ्रात्स-खितन्‌ त ५ च श्रनंतकाल से जीव भिथ्या-कर्मसे संसार मे परिभिमण^ “कर रहा है । तन मिथ्या-कमं को नष्ट करना चाहिए । तक, सम्यक्त्व হসা ই ? इस्तका समग्र वणेन कुन्दकुन्दाचायेजी नै -समयसार, प्रवचनसार, पचास्तिकाय, श्रष्टपाहुड ओौर गोम्मट~ सारादि ग्रथों मे किया है। लेकिन उसपर किसको श्रद्धा है ? तब अपना आत्म-कल्याण करलेने वाला जोव श्रद्धा से सुख किससे;होगा इसका अनुभव लेता है। ऐसे ही संसार में 'अझनादि काल से जीव परिभ्रमण करता आया है, फिर हने वया करना चाहिए ? दर्शनमोहनीय कर्म को नप्ट करना चाहिए। दर्शनमोह- “नीय कर्म आत्म-चितन से नष्ट होता है। कर्म की निर्जरा आत्म-चितन से ही होतो है | दान-पूजा करने से पृण्य प्राप्त होता है । तीर्थ॑यात्रा करनेसे पुण्य प्राप्त होता है, हरएक धम्‌ का उद्देश्य पुण्य प्राप्त करना है। कितु केवलज्ञान होने के लिए, अनंत कमं की निजेराके लिए श्रात्म-चितन ही उश्ाय है। यह आत्म-चितन चौबीस घटे में से छह णडी उत्कर चार घड़ो मध्यम, दो घडी जब्रन्य, कम-से-कम दब्य-पद्रह मिनट या हमारे कहने से पाच मिनट आत्स-चत्रितत कौजिये। ` भ्रात्म-चितन के सिवाय सम्यक्त्व नहीं प्राप्त होता, बार का बंधन नहीं टूटता, जन्म, बुढापा, मृत्यु नहीं छूटती । रग्यक व्‌ के सिवाय दर्शन मोहनीय कर्म का क्षय नही होता । सम्यऋद होकर छियासठ सागर तक यह जीव रहेगा। इसलिए चारिन्‌ मोहनीय कर्म का क्षय करने के लिए सयम ही धारण करना चाहए । सयम्॒ के सिवाय चारित्र मोहनीय कर्म का क्षय नहीं




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