भगवान बुद्ध | Bhagavan Budh

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
1.07 MB
कुल पष्ठ :
74
श्रेणी :
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यशपाल शर्मा - Yashpal Sharma
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योगेन्द्र शर्मा - Yogendra Sharma
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)श्र
1 नहा डी
थे । उनके इस व्यवहार को देखकर सिद्धार्थ का हृदय
रो उठा । उन्हें भपार कप्ट हुप्ा । उन्होंने भ्रपते मन
में कहा, “मनुष्य कितना निर्दय हों गया है । इसे ग्रपने
आराम भौर स्वार्य के समक्ष किसी की चिन्ता नहीं ।
बेचारे वेज़वान जानवरों के साथ यह कितना निर्दयता-
पूर्ण व्यवहार करता है ।”*
सिंद्धारयं के नेयों में जल भर । वह उस हृस्य
को देस न सके श्रौर चुपचाप उत्सव से उठकर चाहर
चले श्राए । वह नेत्र बन्द करके एक यृक्ष के मोचे
जाकर बैठ गए 1
1” , जब उत्सव समाप्त हुमा घ्रौर महाराज घुदोदन
को सिद्धार्थ श्रपने-निकट बैठा न मिला तो उन
सिद्धार्थ की खोज की । यह श्रपने मंत्रियों के साथ वहाँ
से घाहर श्राकर इघर-उधर सिद्धार्थ को खोजने लगे ।
सखोजते-खोजते जब वे लोग उस बक्ष' के निकट पहुँचे
जिसके नोचे सिद्धार्थ वैठा था तो उसे देखकर वे
श्राइचयेचकित रह गए ।
+. ... महाराज ने श्रागे बढ़कर सिद्धार्थ को श्रपनो छाती
से लगाकर पूछा, “वेटा ! तुम इतने उदास बयों हो ?
चया किसी ने तुम्हें कुछ कहा है?”
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