भगवान बुद्ध | Bhagavan Budh

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यशपाल शर्मा - Yashpal Sharma

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योगेन्द्र शर्मा - Yogendra Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्र 1 नहा डी थे । उनके इस व्यवहार को देखकर सिद्धार्थ का हृदय रो उठा । उन्हें भपार कप्ट हुप्ा । उन्होंने भ्रपते मन में कहा, “मनुष्य कितना निर्दय हों गया है । इसे ग्रपने आराम भौर स्वार्य के समक्ष किसी की चिन्ता नहीं । बेचारे वेज़वान जानवरों के साथ यह कितना निर्दयता- पूर्ण व्यवहार करता है ।”* सिंद्धारयं के नेयों में जल भर । वह उस हृस्य को देस न सके श्रौर चुपचाप उत्सव से उठकर चाहर चले श्राए । वह नेत्र बन्द करके एक यृक्ष के मोचे जाकर बैठ गए 1 1” , जब उत्सव समाप्त हुमा घ्रौर महाराज घुदोदन को सिद्धार्थ श्रपने-निकट बैठा न मिला तो उन सिद्धार्थ की खोज की । यह श्रपने मंत्रियों के साथ वहाँ से घाहर श्राकर इघर-उधर सिद्धार्थ को खोजने लगे । सखोजते-खोजते जब वे लोग उस बक्ष' के निकट पहुँचे जिसके नोचे सिद्धार्थ वैठा था तो उसे देखकर वे श्राइचयेचकित रह गए । +. ... महाराज ने श्रागे बढ़कर सिद्धार्थ को श्रपनो छाती से लगाकर पूछा, “वेटा ! तुम इतने उदास बयों हो ? चया किसी ने तुम्हें कुछ कहा है?”




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