जीवन का काव्य | Jeevan Ka Kavya

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Jeevan Ka Kavya by काका कालेलकर - Kaka Kalelkar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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८ जीवनका काव्य बहुत खुशी हुओ হী জূজ वक्‍त भी हमें कुछ नहीं खाना चाहिये ॥ मिष्टान्न भोजन या अतिआहार तो करना ही नहीं चाहिये । दुःखम जिस तरह पाचनशक्ति क्षीण ही होती है, असी तरह आनन्दकी आत्तेजनामें और क्षोभर्में भी जैसी ही' हालत होती है। जिसलिओे किसी भी कारणवश चिक्तका स्वास्थ्य नष्ट हो गया हो, तो अुस समय अनशन या अल्पाहार ही अचित है। जन्माष्टमी जैसे अुत्सवके अवसर पर हम जो अपवास करते हे अुसका अुद्देश्य जिससे भी विशेष है। जन्माष्टमी क्ृष्णजन्मका समारोह नहीं, बल्कि क्ृष्णजन्मकी साधना है। द्वापर या त्रेतायुगर्में क्ष्णजन्म' हुआ असमे हमें क्या मतलब ? जब हमारे हृदयमेः कृष्णजन्म होगा अुसी समय हम पुनीत होगे । हमारे बचपनमें जिस प्रकारके अपवास करनेका हमें अधिकार गे था। आुपवास तो घरके बड़े-बूढ़े लोग ही करते थे। हम तो लड़के थे। दोनों शाम डटकर भोजन करके पूजामें मदद करना ही हमारा धर्म था। हालत यह थी कि घरके बड़े लोगोंको अपवास करते देख हम भी अुपवास करनेका हठ करते और रो-धोकर और कभी मारः खाकर भी न खानेका अधिकार प्राप्तं करते। सच देखा जाय तो अपवास ओक साधना है । जिस तरह नहानेसे पवित्रताका अनुभव होता हं, ओर मौन धारण करनेसे आध्यात्मिक वातावरण प्राप्त किया जाता है, अुसी तरह अुपवाससे हम अन्तर्मुख हीति है; ओर सात्विक वृत्तिको भी विकसित कर सकते है । हरमेक भोजनके साथ शरीरम अक प्रकारकी जड़ता तो आ ही जाती है। भुसे टालकर शरीरका बोझ हलका करनंसे ध्यान या. अपासनाके ভিজ अनुकर परिस्थिति पैदा होती है। भुपवयन, अपनिषद्‌, अुपवास और ओअुपासना ये चारों शब्द अकसे हें। जिस तरह ब्रह्मचयंका मूक अर्थ वीयरकषा नहीं ह, जुसी तरह सुपवासका मूल अर्थ भी अनशन नहीं है। अहाचयके भानी' हें, औरवर-प्रप्तिके लिजे वेदशास्त्रके अध्ययनमें तन्मय:




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