भूतनाथ | Bhutnath

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Bhut Nath Part I To Iii by देवकी नंदन खत्री - Devki Nandan Khatri

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्षु पहला हिस्सा भ्रव पिछले पहर की रात वीत रही है, चारो तरफ सन्नाटा छाया हुप्रा है, इन चारो के पैरो तले दवने वाले सुखे पत्तो की चरमराहट के सिवाय श्रौर किसी तरह की श्रावाज सुनाई नहीं देती । भूतनाथ इन तीनो को साय लिए हुए एक ग्रनूठें ्रौर श्रनजान रास्ते से वात की वात में पहाडी के नोचे उतर श्राया श्रौर इसके वाद दक्षिण की तरफ जानें लगा । जगल ही जगल लगभग शभ्राघा कोस के जाने वाद ये लोग पुन. एक पहाड़ के नीचे पहुंचे । इस जगह का जगल बहुत हो घना तथा रास्ता घूमघुमौवा धौर पथरीला था । भूतनाथ इस तरह घूमता श्रोर चक्कर देता हुमा पेचीली पर जाने लगा कि कोई श्रनजान श्रादमी उसकी नकल नहीं कर सकता था, श्रथवा यो समझना चाहिये कि भूतनाथ के मकान का रास्ता ही ऐसा पेचीला श्रौर भयानक था कि एक दो दफे का जानकार श्रादमी भी धोखे में श्राकर अमटक सकता था, किसी श्रनजान का जाना तो बहुत ही कठिन वात है । कुछ ऊपर चढ़ने के वाद घूमता फिरता भूतनाथ एक ऐसी जगह पहुंचा जहा पत्थरों के वड़ें वडे ढोको के छिपी हुई एक गुफा थी । इन तीनो को लिए हुए भूतनाथ उस गुफा के श्रन्दर घुसा । श्रागे श्रागे भूतनाथ, उसके पीछे गुलावसिह, उसके वाद इन्दुमति धर सबके पोछे प्रभाकररसिंह जाने लगे । कुछ दूर गुफा के श्रन्दर जाने वाद भूतनाथ ने श्रपने ऐयारी के वटटुए में से सामान निकाल कर मोमवत्ती जलाई श्रौर उसकी रोशनी के सहारे श्रपने साथियों को ले जाने लगा। लगभग पचीस गज के जानें वाद एक चौमुहानी मिली श्रर्वात्‌ एक रास्ता सीधी तरफ चला गया था, दूसरा वाई तरफ, घौर तीसरी सुरंग दाहिनी तरफ चली गई थी, तथा चौथा रास्ता बह था जियर से वे श्राये थे । यहा तक तो रास्ता खुलासा था मगर का रास्ता वहूृत हो वारीक श्रौर तग था जिसमें दो श्रादमों वरावर ने मिल कर नहीं चल सकते थे । यहाँ पर शाकर भूतनाथ श्रटक गया श्रौर मोमबत्ती की रोशनी में झागे की तीनों सुरज्णों को बता कर श्रपने साथियों से वोला, “हमारे मकान




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