हैदर अली | Haidar Alii

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Haidar Alii by पं. रघुवरदयालु मिश्र - Raghuvar Dayalu Mishra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ष् शाम के वक़्त की सुनहरी किरनें पहाड़ों पर चढ़ चुकी हैं । चिड़ियाँ चहचहा कर दुनियाँ से आज का काम-काज बन्द करने की आरजू क़र रही हैं। कावेरीपड्रणम क्रिठे के अन्दर बड़ा-सा ामियाना खड़ा है। शामियाने के नीचे हेदरअली शाह मसनद पर बेठे हुए हैं । मसनद पर लाल रंग की रेशमी चादर पड़ी हुई हे। हेदर शाह का बदन गठीला और कद मन्लोठा है। रंग सौंबला और चेहरा दमकता हुआ हे । सिर पर छाल रंग का बड़ा साफ़ा है-- जिस पर कठंगी बंधी हुई है। रोब चेहरे से टपक रहा है। अग्ल-बग़ल में शरीर-रक्षक और दीवान पू्णय्या कारगुज़ार कृष्णराव और सिफहसालार फ़ज़लुछलाह खाँ चग्रेरह बेठे हुए हैं। हेदरशाह की आवाज़ इतनी साफ़ और कड़ाके की हे कि सुनकर दोर भी एक बार सहम जाय । रिपोट पर रिपोट सुनायी जा रही है। चिदट्टियाँ िखायी जा रही हैं। जासस अपना बयान सुना रहे हैं। हर कागज़ पर फ़ारसी का उल्टा हे लिखकर शाह अपने दस्तखत करते जा रहे हैं। मानों मशीन चल रही हो। दरबार में गंभीरता छायी हुई है । इतने में सभी लोग भड़भड़ा कर उठ खड़े होते हैं । सबके सिर झुक जाते हैं। आदत के मुआफ़िक हाथ बंदगी के ढिए उठते हैं। हैदरशाह भी एकाएक उधर देखते हैं।




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