अष्ट प्रवचन | Ashta Pravachan

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Ashta Pravachan by हरिलाल जैन - Harilal Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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89585867758 र এ ০ द वी श्व ~£ “शष्ट प्रवचने पुस्तक के विषय में हम अपनी ओर से क्या कहें ओर इस प्रसंग में छुछ कहना हमारा काम भी नहों हे, फिरभी दो झब्दों में यदि कुछ निवेदन करदें तो यह अप्रासंगिक नहों होगा। सांसारिक व्यापार में बहुत समय तक लगे रहने वाढे व्यक्ति दसमें एक न एक दिन थकान का अनुभव करते देँ। तब कुड समय विश्राम ओर मानसिक शांति चाहते हैं। हमें भा कुछ ऐसा ही खगा कि बेभव की प्यास तो कभी न वुश्चन वाली प्यास की तरद् कठिन रोग दे, उद्चाभिडापा एक नश्चा दै ओर यश्चङिष्ठा का श्वर जिसे चढ़ पाता हे कठिनाई से ही उत्रता दे | फिर जीवन के प्रभात के पीछे संध्या और दिन के पौड़ रातं है ओर एक के बाद एक बीतते ही चले जाते हें। मानर-जोवन का खेशय तो कुछ ओर ही है, वह जिम सुष ओर शाति को चाहता है आखिर वह उसे कैसे भर कदां मिटे ! अंतर की इस छहर मे गत वषं पयुषण पवं के अवसर पर हम दोनों भाई सोनगढ की ओर चल पड़े। वहाँ पर पूज्य गुर देव भरी कानजी स्वामी के दर्शन हुये और छगातार कुछ समय तक उनके कल्यागकरारों सत्समागम में रहने का অনবরত গা हुआ। उनऊे जीवन का एक एक क्षण सावतामय दे । उस অনয হ্বাদী নী ক সন্ববন প্রা सवयततार को ४७ शक्तियों के ऊपर चड रहे थे। उनरे मुखारत्िंद से उन्हें बड़ो ही सरल ओर रोचक शेडी में सुनकर मनमें अत्यंत आनंद का अनुभव हुआ । उसी समय एक विचार मनमें आया कि दम ढोग भी तारण स्वामी के प्रंथों फे पाठ-स्वाध्याय कुछ न कुछ प्रतिदिन




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