महा कवि हरिऔध | Maha Kavi Hariaudh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हरिओध की लोकप्रियता । बहुत दिनों की बात है, तब मे आजमगढ़ के एक स्कूल में पढ़ता था । परीक्षा के दिन थे, किन्तु तुकबन्दी का नशा सिर पर कुछ ऐसा सवार था कि एक नवीन रचना लेकर में हरिऔथ जी की खोज मे निकल पड़ा । उसके पहले मैने उनके दर्शन नहीं किये थे | जाड़े के दिन थे; सबेरे की धूप अच्छी तरह छिटिक चली थी। वे खड़े-खड़े किप्ती भाव-लहरी में निमम्न थे | उनकी कबिल्पूर्ण दृष्टि और भावमयी मुखमुद्रा ने तत्काल ही निश्चय करा दिया कि महाकवि हरिओथ यही हैं । किप्री से पूछताछ किये बिना ही मैंने अपनी तुकयन्दी उनके हाथों मं रख दी । उन्होंने पूछा--'क्या यह कोई कविता है १” मैंने उत्तर दिया--“जी, हाँ।” हरिओध जी ने कहा--/सन्ध्या-समय आइए तो में इसका उचित संशोधन करके इसकी त्रूटियाँ समझा दूँ।” आज्ञानुसार संध्या-समय जब में फिर उपस्थित हुआ तब हरिओऔध जी मेरी तुकबन्दी को बड़ ध्यान से देखने लगे । मैने बाबू मैथिलीशरण गुप्त की निम्नलिखित पंक्तियों के नमूने पर अपनी रचना की थी:--- “प्रिय सखे तव पत्र मिल नहीं । मम मनोरथ-पुष्प खिला नहीं ॥ न॒ इसका तुमको कछ दोप है । बस हमीं पर देविक रोष है॥ जब स्वयं तुम भूर रहे हमे । विधि फ. अनुकूल रहे हमें ॥ >< >< >< > इस कविता मं संस्कृत के द्रतविलम्बित वशेवृत्त का प्रयोग किया गया है । परन्तु दुर्भिल छन्द के साथ मैंने इसकी ऐसी खिचड़ी पकायी




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