हिमालय मे भारतीय संस्कृति | Himalaya Me Bharatiya Sanskrati

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Himalaya Me Bharatiya Sanskrati by प्रोफेसर वासुदेव - Prof. Vasudev

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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हिमालय पौराशिक ग्रंथों में हिमालय को देवताग्नों और देवाड्भनाओं की क्रीड़ा-भूमि बताया गया है । उनका कहना है कि हिमालय देवतात्मा है. हिमालय शिव स्वरूप है । शिव और पाव॑ ती का सम्बन्ध हिमालय के साथ जुड़ा हुआ है। उनके विचारा- नुकूल न जाने कितने देवता आज भी हिमालय के उन्नत शिखरों पर वास करते हैं । हमने जिस समय प्रथम वार वदरीनाथ की यात्रा की तो पण्डा ने हमें बताया कि मंदिर के दोनों तरफ जो विशाल शिखर दिखाई दे रहे हैं, इनके नाम नर और नारायण हैं । इन पर नर और नारायरा नाम के दो तपस्वी श्राज भी तपस्या करते हैं । हिमालय में देवताओं के निवास की इस प्रकार की अनेक गाथायें जुड़ी हुई हैं । हिमालय भारत माता का स्वर्ण मुकुट है। हिमालय का सम्बन्ध युग-युगों से भारत के महापुरुषों, ऋषियों और तपस्वियो के नामके साथ जुडाहै। इसकी कन्दराओं और उपत्यकाश्नों में भगवान्‌ शंकराचाय ज॑से तत्वदर्शियों ने साधना की है । हिमालय वसुधा के लिए अनुपम कोषागार है । हिमालय अनेक सरिताओं का उद्गम स्थान है जिनमें इस देश को यौरवान्वित करने वाली गंगा और यमुना जैसी नदियाँ सम्मिलित हैं । हिमालय खनिज-सम्पत्ति का अनूठा भण्डार है । हिमालय साधना करने वाले व्यक्तियों के लिए तपोभूमि है। हिमालय का अनुपम सौन्दर्य अनायास ही मानव-हृदय को मोह लेता है । हिमालय-आ त्मचिन्तन, ज्ञान और मुक्ति प्राप्ति के लिए साथकों, चिन्तकों एवं योगियों को प्रश्रय देता रहा ट । न जाने कितने तप्वियो मरौर महापुरुषों ने इसे ्रपना साधना-क्षेत्र वताया । इसकी कन्दराश्रों में अ्रनेक ग्रंथों की रचना हुई। महाकवि कालिदास ने इसकी उपत्यकाओं में जो काव्य-रचना की, वह आज संसार के विद्वानों को भी विमुग्ध कर रही है । हिमालय की उपत्यकाओं में भारतीय संस्कृति का उदय हुआ, उस संस्कृति का जो अनेक झ्राघात सहकर भी ज्यों की त्यों अ्रक्षुण्ण बनी हुई है। इसका मनमोहक सौन्दर्य कलाकारों और चित्रकारों को श्रनायास ही मोहित कर लेता है । ग्रस्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः। --कालिदास




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