हिंदी तथा मलयालम की आधुनिक साहित्यिक शब्दावली - खंड 1 | Hindi Tatha Malyalam Ki Adhunik Sahityik Shabdawali - Khand 1

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Hindi Tatha Malyalam Ki Adhunik Sahityik Shabdawali - Khand 1 by एल० सुनीताबाई - L. Sunitabaiजे० सुगंधबल्ली - J. Sugandhballiडॉ एन. ई.विश्वनाथ अय्यर - Dr. N. E. Vishvnath Ayyar

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एल० सुनीताबाई - L. Sunitabai

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जे० सुगंधबल्ली - J. Sugandhballi

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डॉ एन. ई.विश्वनाथ अय्यर - Dr. N. E. Vishvnath Ayyar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वैदर्भी, गौडी, पांचाली, आदि देशभेदाश्रित रीति पर विचार करनेवाले वामन इन रीतियों के गुणों का जो विवेचन करते हैं उससे स्पष्ट होता है कि भावों की एधानता, प्रसाद का निर्वाह और भाषा की प्रांजलता उत्तम काव्य क॑ उत्तम गुण कहलाती थीं। संस्कृतसाहित्य के प्रेमियों पर छन्‍्दोबद्ध रचना का जो मोह हावी हो चला उसी के फलस्वरूप गद॒य के भेदों में 'व॒त्तगंधि' का विशेष उत्लेख मिलता है ।! छन्द बढ बढकर गद्य के ज्षैत्र में घस गया तो दंडक कहलाया । प्राचीन गद्य में दंडक सी रचना और गदयकाव्य का सा विधान दर्शनीय है। इनका खण्डन करके सरल और चुस्त शैली के पक्ष में किसी आचार्य ने आग्रहपृवेक नहीं लिखा । यदि दंडी आदि कोई आचाय उसके पक्ष मे दृढ मत देते तो शायद आगे के रेखक ऐसा गद्य प्रारंभ करते। इसके अभाव में गदय जटिल रहा । वासवदत्ता आदि ग्रन्थ का गदय गदय की कसौटी बना । गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति की सूक्ति चरु पडी । इन्होंने क वित्वशक्ति के जिन तीन अंगों का वर्णन किया है - वे हैं शक्ति, निपुणता एवं अभ्यास । काव्यरचना के लिए प्रतिभा कि आवश्यकता है । लोकशा- : सत्रादि के ज्ञान की ज़रूरत है और अभ्यास का तो अत्यंत महत्व है ।2 केवल प्रतिभा के आधार पर थीडा सा गुनगुनानेवाले कवियों को कविता चाहे कुछ | कुछ आती हो पर अभ्यास से ही वह मधुर एवं गंभीर बनती है। ये तीन ` शक्ति, निपुणता और अभ्यास आगे चखकर भारतीय काव्यशास्त्र के महत्वपूण शब्द साबित हुए। ५,` €वन्याछोककार भानन्दवद्धंन ने काव्यस्यात्मा ध्वनिः' कहकर जिस सिद्धान्त की स्थापना करना चाहा था वह घ्वनिसिद्धान्त कहलाया । यह्‌ ब्द क.व्यशास्त्र मे अपने साथ केई शब्दों को जन्म दे सका । अविवक्षिता- वाच्यघ्वनि, विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि, संलक्ष्यक्रम व्यंग्य, असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य আহি 15 रसप्रदान' महाकाव्य एवं “तिवृत्तप्रधान' महाकाव्य का विभाजन+ काव्य के प्रभाव कौ दृष्टि से महत्वपुणं ओर काव्यविचार मेँ होने- _ वाली युगानुकूल प्रगति का बोधक है। यों गद्यविधा में प्राचीन दंडक एवं क्लिष्ट गद्यधारा से वचने को जो इच्छा नये गदयकारों में हुई उसी के फलस्वरूप मध्य-समास गद॑य, दीघेसमांसगद्य आदि अंतर गद्य में स्थापित1. वही 1/3/222. काव्यप्रकाश 1/3.3. ध्वन्यालोक, उद्योत 2 || । पृष- भारतीय काव्यशास्व कौ परपरा




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