शाक्य | Shakya

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Shakya by रमेश चन्द्र - Ramesh Chandra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भाज भ्रापका यद्‌ शोमित उससे ही সানাই प्राह्हादित हो करें न मन भे ह &\ बुद्ध भी प्राप विषाद। (५५) वि राजन्‌ इनके जन्म-जन्म केः हैं. प्रदमुत प्रारणन, 5) जन्मजात ये ज्ञानी भुनि हैं मत समझें नादान। (१६) कपिलवस्तु का राजवंश यह्‌ অন্য ই प्राज कृतां जिस त भे प्रवतरित हूए ह प्रति सुन्दर सिदायं ! (५७) इनका मून वेराग्य भाप मत हो ढ्‌ नौ विभिन, 1 सुम्मवदै नयने सन्यासी सष में होकर दिप्त। (४८) जरा-जीणं रोगी कमी ये न देखें, . ` - नहीं चित्त मे स्वत्म स॒न्ठाप पार्ये सदा कीनिषएु মলে है भुष ऐसा व्यया विश्व से ये न कमी कांप जावें। (५६)! গুহ! সর ही यत्न ऐसा करूगा प्रिय सुन पह मेरा दम्य में ही रहेगा, अनुभव न करेगा विश्व की बेदना का, सुखद-मवन में ही सौस्य सारा रहेगा । (५०) ५ & টাল




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