मोक्षशास्त्र अर्थात तत्वार्थ सूत्र | Mokshashastra Arthart Tatvarth sutra

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Mokshashastra Arthart Tatvarth sutra by रामजी माणेकचंद दोशी - Ramji Manekachand Doshi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ इस घूचमें 'निम्नयसम्पम्दप्तन की भ्यास्पा की है ऐसा मर्य करनेके कारण इस प्षास्त्र्म पृष्ठ १६ पे २० में स्पष्टवया दिसाया है वह जिज्ञासुपों को सामघानता पूर्वक पढ़तेक्ो वितती करनेमें आती है। ८--प्रपव-वस्तुस्वरूप अनेकान्त है मौर वन एास्त्र प्रनेकास्त মিতা प्र्तिपादम करते हैं. तो सूत्र १ में कथित निम्मय मोक्षमार्ग भर्तु छुद्रत्तत्रम भौर सूत्र २ में रूषित निम्यय सम्मम्दर्शनकों धमेदाम्त किस নাতি হত हैं! उत्तर--(१) निम्मय सोक्षमार्ग बद्दी लरा (सा ) भोक्षमाग है और प्यबहार मोक्षमार्य सच्चा मोक्षमाग गहीं है; तभा निम्नय सम्पग्दक्षेग बही सच्चा सम्य्दर्शन है, ब्यवह्वार सम्मम्वर्शम स्पा एम्मण्दशंन नही ह । प्रौर (२) षह स्वाभमते ही प्रगट हो सकता है--और परालयसे कभी भी प्रमट हो सकता नहीं ऐसा अमेकास्त है। (३) मोसमार्ग परममिरपेक्ष है अर्थात्‌ उसे परको प्रपेक्षा मही है किम्तु तीर्मों काप्त स्वडी भपेक्षासे ही बहू प्रगट ही घरृता है, बह प्रमेकान्त है । (४) इसीसिये बह प्रगट होमे पांधिक स्वाभय भौर माणिक पराश्यपना है--( अर्थात्‌ बह लिमित्त भ्यबहार मेद अआदिका प्रायसे है) एसा माममा भहु पर्षा अनेकान्त सही है परस्तु बहु भिप्पा-एकान्ध है इसप्रकार निःसवेह वङौ करना बहो यतेकाम्त निचाह। (५) सच्चा सोक्षमाें स्वाश्रयसे मो हो भर पराश्षमसते भी हो ऐसा मामा जाये तो उसमे मिश्रय प्रौर भ्यवहारका स्वस्य { भो परस्पर भिस्दतता लक्षण सहित है बहू न रहकर ) एकमेकं हो छाय-मिश्यय श्रौर ब्यबह्दार दोनोंका सोप हो भाप मव ऐसा कभी होता मही ।




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