अशोक | Ashok

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Ashok by गोविन्ददास - Govinddas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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বৃহন | पहला श्रंक । [ ७ [ श्रशोक सिर भुकाकर कुछ सोचने लगता है । গজ নি- मित्रा उसको श्रोर देखती है । कुछ देर निस्तव्धता ।] अशोक : (सिर उठाते हुए) पर एक वात जानती हो, प्रिये ? असंधिमिन्ना : क्या ? श्रश्ोक : मुझे कई वार संस्कृत की एक उक्‍्ति स्मरण हो श्रातों है । श्रसंधिरमित्रा : कौनसी ? अशोक : वीरः भोग्या वसुन्धरा । श्रसंधिमिना : (कुछ श्राइचर्य से) तो क्या मौर्यवश मे गृह कलह होगा, प्रिय ! प्रशोक : सुसीम के सहश पुरुपार्थहीन, श्रकरमण्य, नपु सक व्यक्ति के हाथ में भारतीय साम्राज्य की सत्ता जाने ग्रीर उसके विध्वंस, नष्ट-अ्रष्ट होने की अपेक्षा मोर्यवंश का गृह-कलह कदाचित्‌ कहीं अधिक कल्याणकारी होगा * [ प्रतिहारी का प्रवेश । प्रतिहारी वृद व्यक्ति है; लम्बी म्‌छे भ्रौर इवेत दाढ़ी है। ऊपर के अंग में एक लम्बा कंचुक पहने है श्रौर दोचे के प्रंग में अधोवस्त्र । सिर पर पगणड़ो है। अंगों में स्वर्ण के भूषण हैं । उसके हाथ में एक लम्बे पोंगले में राजपत्र हें। वह श्राक्र भुककर घ्रभिदादन फरता है तवा पत्र श्रशोक फो देता है । | अतिहारी : मगध से राजराजैश्वर का वह पत्र लेकर एक परदवा रोही श्राया है श्रीमान्‌ ¦ [ श्र्लोक पोगला पतो सोलकर पत्र पट्ता हं 1 श्रतंधिमित्रा




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