वेदों का यथार्थ स्वरुप | Vedo Ka Yatharth Swaroop

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Book Image : वेदों का यथार्थ स्वरुप  - Vedo Ka Yatharth Swaroop

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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विषयानुक्रमणिका १५ वैद विषयक प्रयत्न अधिकतर पक्षपातपूर्ण : प्रो० मेक्समूलर के ड्यूक ्रार्गायल श्रौर जपनी पत्नी के नाम पत्र : भरी भ्ररचिन्द द्वारा इन पाश्चात्य विद्वानों को वेद विषयक घारणाओं फो निष्पक्ष मालोचना : श्री रमेशचन्दत्त, सोकमान्य तिलफ, श्रो भ्रविनाशचन्ध दास, श्री हिजेद्धदास इत्यादि पर पाश्च त्थ सरणि फा प्रभाव : वैदिक एन्‌ के लेको फो भवरुफरण प्रवत्ति : महृषि दयानन्द फा चेदों के महत्त्व विषयक सिहनाद : उस समय वेदों फी उपेक्षा * राजा राममोहन राय और वेद : श्री शकराचार्य, रामानुजाचार्य, वत्लभाचार्यादि मध्यकालीन आचार्यों के वेदाघिकार विषयक प्रनुदार विचारों से तुलना : रोमां रोला की मह॒पि दयानन्द _की उदारता के प्रति श्रद्धांजलि : सुप्रसिद्ध योगी श्री अरविन्द के वेद शोर सायसाभाष्य तया महर्षि दयानन्द के वेद भाष्यादि विषयक विचार । द्वितीय अध्याय वेदों का महत्व और उसके कारण--विविध मतावलम्बी विद्वानों द्वारा समर्पित श्रद्धाजलिया पृ० ६३---११० ईइवरोय ज्ञान की भावश्यकता : सम्राद्‌ श्रसुरवाणीपाल, सम्राट्‌ फ्र डरिक, बादशाह अकबर प्रादि के परीक्षण : हैवल का मत * सुप्रसिद्ध वेज्ञानिक डा० फ्लेमिड्भ हारा ईश्वरीय ज्ञान की प्रावदयफता का समर्थन, सुविख्यात प्लेटी, कान्‍्द इत्यादि द्वारा इस का प्रनुमोदन * सदसद्विवेकबुद्धि की श्रपर्याप्तता * प्रकृतिवादियों फी युक्षिययों का विवेचन * प्रकृति में जिस को लाठी उस की भेस * पारसो विद्वान्‌ फर्दून दादा चान्‌ जी द्वारा वेगे फो श्रद्धाजलि : वेदों में भ्ररिन के भोतिक प्ौर आाष्यात्मिक प्रथं : वेदों में विशुद्ध एक्रेइवरवाद : जैन शिद्वान्‌ प्राचारय फुसुदेन्दु द्वारा वेद को अनादि निघना श्रादिभगवद्वाणी कहना : श्ररव के विदान्‌ लावो दारा वेर्दो का गुरागान : दारा शिक्रोह का वेद को ईडवरीय ज्ञान मानना ड'० रसेल वेलेस, रेवरेन्ड्‌ मौरिस फिलिप, प्रो० होरेन, लेश्नों देल्वो, नोवल पुरस्कार विजेता श्री मर्टलिक, थोरियो, डा० जेंम्तकज्न्स, झसी विद्वान्‌ श्री बौलंगारु, सि० सास्करो, सि० ब्राऊन, शौपनहार, रागोजिन, जेक्रोलियट मिसेज छोलर आदि निष्पक्ष पाइचात्य घिद्दानों भ्रोर विदृधियों द्वारा बेद का महत्त्व स्वीकार करना . बेद ही ईश्वरीय ज्ञान वर्षों ? वादवल कौ मनेक तकं तया विज्ञान विरुद्ध वातें . वर्मिद्धम के चिशप डा० वान्त का एत- हिषयक भाषण . वेदों में विचिघ विद्याओं का मूल निर्देश । तृतीय अ्रव्याय ऋषि मन्त्रकर्ता नही, मन्तरद्रष्टा थे पृ० १११-१५६ कई जाघुनिक विद्वानों के मत में ऋषि मन्त्रकर्ता इस मत की परीक्षा . ऋषयो भस्त्रद्रष्टार: । इत्पादि वचन ।




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