देवनागरी लिपि स्वरूप, विकास और समस्याएँ | Devnagari Lipi Swaroop Vikas Aur Samasyayen

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आचार्य नंददुलारे वाजपेयी - acharya nanddulare vajpayi

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डॉ. नरहरि चिंतामणि जोगलेकर - Dr. Narhari Chintamani Joglekar.

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भगीरथ मिश्र - Bhagirath Mishr

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ ९ ) देवनागरी लिपि की कहानी ठीक इसके विपरीत है । यह विद्व के विद्वानों को मान्य है कि देवनागरी लिपि भाषान्तगंत प्रयोगों में आने वाले अधिक से अधिक ध्वनि-चिक्लों से समृद्ध है । लगभग प्रत्येक ध्वनि के लिए इसके अन्तगंत अलग-अलग चिह्न हैं और इसको सीखने पर फिर वर्तनी-संबंधी झंझटें मिट जाती हैं । स्पेलिंग याद करने की आवदयकता नहीं रहती और इसके लिए शुद्ध उच्चारण ही पर्याप्त हैं । इसकी ध्वनियों का वर्गीकरण भी स्वर-व्यंजन तथा उच्चारण-स्थानों के आधार पर बड़े वैज्ञानिक ढंग पर किया गया है । विभिन्‍न ध्वनियों के चिह्न भी लगभग सभी ऐसे हैं कि जिससे दूसरे ध्वनि-चिह्लों का श्रम उत्पन्न न हो । कहने का तात्परयं यह है कि ध्वनि-संबंधीं जितनी भी सुविधायें परिकल्पनीय हैं उनमें से अधिकांश देवनागरी लिपि में प्राप्त होती हैं । इसके अतिरिक्त देवनागरी लिपि का वर्तमान स्वरूप युगों के प्रयोगों पर आधारित विकास का प्रतिफल है । इसी कारण से उसके पीछे काफी दीघे-प्रयोग की परंपरा है । इसके साथ-साथ इस लिपि के द्वारा ही जिस साहित्य-भण्डार के भीतर प्रवेश किया जा सकता है वह संस्कृत प्राकृत हिन्दी मराठी आदि भाषाओं का साहित्य-भ्रष्डार बहुविघध एवम्‌ संपन्न है । यह सब होते हुए भी इसे आधुनिकतम कार्यों में प्रयुक्त करने में कुछ लोग हिच- किचाहट का अनुभव करते हैं । अधिकांशत इसके दो कारण हैँ । प्रथम तो किसी अन्य भाषा और विशेष रूप से रोमन लिपि के प्रति मोह और उसकी सुविधाओं का अभ्यास है और दूसरा देवनागरी लिपि को आधु- . निकतस कार्यकलापों के लिए उपयोगी बनाने के व्यवस्थित वैज्ञानिक एवम्‌ सामूहिक प्रयत्नों का अभाव है । विश्व के और अधिकांश भारतीय विद्वान देवनागरी की सर्वाधिक सुविधापूर्णेता और ध्वनि-संबंधी व्यवस्था की विशेषताओं को स्वीकार करते हैं । लेकिन फिर भी इसे भाषा को व्यवहारोपयोगी बनाने का उत्तरदायित्व हमारा है और हमें इस दिशा में निद्चित कदम बढ़ाने चाहिये । अपेक्षाकृत कम वैज्ञानिक रोमन लिपि को समग्र आधुनिक व्यवहारों के लिए उपयुक्त लिपि का रूप दे दिया




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