यादों के वातायन से | Yadon Ke Vatayan Se

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Yadon Ke Vatayan Se by कन्हैयालाल शर्मा - Kanhaiyalal Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अपने स्मर्तव्य को अपनी सृजन-दृष्टि से सप्रेष भोयता प्रदान करने तक हां उसका शित्प परिसामित हो जाता है। तब उसकी भाषा-शै लो कैसी हा ? इसका सक्षिप्त उत्तर यह है कि वह प्रभावोत्पादक और सुस्पष्ट होना चाहिए। विषयानुरूपता के साथ लंसक का व्यक्तित्व भा उस सयमित एवं नियमित करतए है। एक श्रेष्ठ सस्मरण में सस्मरणकार की प्रस्तुति में यथार्थता वी रक्षा क लिए कथांपकथन की स्वल्पता अपक्षित है। जां कथापकथन नाटक, कहाना, उपन्यास आदि में अपना उपस्थिति उनकी कलात्मकता एवं अपरिहायता सिद्ध करते हैं व॑ स्मरण में स्व॒ल्प हूप में प्रयुक्त किये जाव पर भा कल्पना-प्रसूत से लगने लगते हैं। उनवी विद्यमादता सस्मरण की रोचकता में तो वृद्धि करती है, पर उनकी स्मृति-जन्पता पर प्रश्न-चिक्ठ लगातो है। सस्मरणकार को सदैव यह ध्यान रसना पडता है कि वह सत्मरण लिस रह्टा है, कहानी नहीं। बधन में मुक्ति समयकर लिसा गया सस्मरण अधिक प्रभावोत्पादव और कलात्मक बनता है। सस्मरण नवीन विकसित विधा है। इसने अपना स्पष्ट एवं निश्चित स्वरूप स्थापित कर लिया है, पर अनेक ऐसी विधाए हैं जिनसे इसकी भिन्‍्नता पहचातना आवश्यक हो जाता है। आत्मकथा, जीवना, रेसाचित्र, कहानी, निबघ (ललित भी), यात्रावृत्त साक्षात्वार्ता (इंटरव्यू), ममायर आदि से उसकी भिन्‍नता को परिलक्षित करना यहा आवश्यक हो जाता है। इन विधाओं से सस्मरण की इतनो समानताए मिलता हैं कि समालोचक कभा-कभी दो टूक निर्णय कर पाने में असमर्थ से दिखाई पड़ते हैं। आत्मकथा लेसक के अपने जीवन वा आद्यापान्त आघ्यान है, पर सस्मरण तो उसके जौवन का सस्मृतं रोचक भश मात्र होता है। अत सस्मरण पाठक के लिए उबाऊ नहीं होता, जबकि आत्मकथा में इसकी सभावना रहती है। आत्मकथावार की एकान्तत अतर्मुस-प्रधानता सस्मरणकार की बहिर्मुखता की प्रवृत्ति से उल्लेखनीय भिनता प्रकरातो है। आत्मकथा प्राय स्यातिप्राप्त व्यि ही लिखता है, पर सस्मरण लेखक के लिए ऐसा बाध्यता नहीं है। हा, वह भपने सस्मृत पात्र का चयन अपनौ मनोनुकूलता से हा करता है जो प्राय स्थापित होता है। जीवनी एवं सस्मरण में वस्तुनिछठता होती है। सस्मरण लेखक की तीव्र चयन~ सुविधा से उपजता है पर जीवनी में लेखक की चयन तीव्रता विस्तृत जीवनार्शो मेँ सर्वत्न समान नहों बनी रहतो। जीवनोकार इतिहासकार पहले होता है कितु सस्मरणकार साहित्यकार पहले और इतिहासकार बाद में होता है। श्रेठ जीवनीकार को चयन के पश्चात्‌ तटस्थता बनाये रसना होता है पर सस्मरण के लिए आवश्यक गुण नहीं है। जीवनाकार जीवन को सपूर्णता में चित्रित करता है पर सस्मरणकार तो उसके एक या अनक अर्थो तक अपने चित्रण को सीमित कर लेता है । सस्मरणकार के भूमिका 15




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