शेर ओ सुखन भाग - ५ | Sher O Shukhan vol-V

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भ = ९ ~ मिल जाता है। पर तुम जानो, भ्रकान और 'ज्योर्त/ जैसे भाई लोगोंके बगैर क्या ताभका मज़ा ? वे ज्ौक़की महफिलें थी, यहाँ घंवा समझो । तुम्हीं कहो कि युद्धाय स्तनस-परस्तोका = बुतोकी हो अगर ऐसी ही खू तो क्‍यों कर हो ? ; रावलूपिण्डी १८-१२-४६ - ““त्रका उत्तर तो तुरन्त दोगे ना ? अरे वावा मुझे कहो ती में डालमियानगर भी आनेको तैयार हूँ। साइल का वह गेत्र याद दिका दू-- बदे-चभुदा वोह भा जायें, न जायें मुझको बुलवालें। इनायत यूं भी और यूँ भी, करम यूँ भी हूँ और यूँ भी ॥ रावरूपिण्डी ९-१-४५ “नये सालकी बधाई । मगर आप हे कि चिदठी ही नहीं लिखते। भई ऐसा नहीं चाहिए। वकौल “জিমহ--. एक तजल्लो एक तबस्सुम एक निगाहे-बन्दानवाज নজ यही कृ हमारे क्षु काफी ই। रोहतक ९-२-४७ पत्रोत्तर देनेमे मुभ विलम्ब हृश्रा तो वत्तौर उच्महना पत्रमे रवि सिद्दीकी केवल निम्न शेश्रर लिख भेजा 1] ५“ चिन्दगो क्यो हमातन गोहा हुई जाती है! ~~ कमी आया हूँ जो आयेगा দাদ उनका ? रोहठक २४-३-४७ {+ খু! “आपको रावलूपिण्डीके नूरपुरके मेलेके बारेमे बताया था ना ? जहॉहसमाल कई नी गानेवाली जमा होती हें और चडे ठाठका मेला




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