आत्मतत्व - विचार [भाग - ३] | Atamtatv Vichar [Bhag - ३]
श्रेणी : काव्य / Poetry
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
19 MB
कुल पष्ठ :
848
श्रेणी :
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)নাছजेनाचाय श्री विजयरक्ष्मण सूरीश्वरजी की यह कृति वस्तुतत
कर्म-ग्रन्थो की छुन्नी हे और समस्त प्राचीन-अवाचीन कर्म-दशन-
सम्बन्धी ग्रन्थो का सार है । यह ग्रन्थ न केवछ जिज्ञासु वर्ग को
कर्म-दशन का परिचय प्राप्त करान में समर्थ हे वल्कि विद्वत्-
वर्ग की शकाओं का समाधान करने तथा जञास्त्रीय और परम्परा-
गत मान्यताओं को स्पष्ट करने में मी समर्थ हे ।जेनाचाये जितने वड़े विद्वान हैं, उतने ही योगो मी | आपने
सूरिमंत्र के पाँचों पीठ सिद्ध किये हैं प्रथम ओर द्वितीय पीठ
आपने रोहिडा ( राजस्थान ) से सिद्ध किया, तीसरा और चौथा
पीठ अँधेरी ( वम्बई ) में सिद्ध किया और पॉचवोँ पीठ महाराष्ट्र
के निपाणी के चातु्मोस में आपने सिद्ध किया। इसके अतिरिक्त
मी आपने कई सावना की हे ।आचार्यश्री की व्याख्यान-शैली के सम्बन्ध मे तो कुछ कहना
ही नहीं है| प्रस्तुत अन्थ ही इस वात का प्रमाण है कि, वे
क्विप्ट-से-क्लिप्ट विषय को कितने रोचक ढग से प्रस्तुत करतेमे
समथे हैं ।मकरसक्रान्ति, १०१६ वि०
1 ज्ञानचन्द्रदफ्तरी वादी, व
चिंचोली, मलाड, वम्बई ६४ € द )
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