विश्रुतचरितम | Vishrutcharitam

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्रगु ] 1 [१३ आरहा है, किसी के लिए ऐसी पुस्तकें लिखना और प्रकाशित कराना महा- पातक माना जाता हैं और किसी के लिए महान्‌ बज्ञमय, प्रशंसतोय और पुरस्काराह खमा जाता है; तथापि संसार में अनेकों गुणाग्राहक अव्यायक, विद्वान और विद्यार्थियों ने इस रचना को अपनाया है ओर इस की भुरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इस प्रयास को और लेखक की ऐसी समस्त रचनाओं को वाञ्छनीय माना है । उन के सहयोग के कारण ही इस का तथा अन्य रचनाश्रों का पुनः अथवा नवीन प्रकाशन किया गया है! आझा है पाठक पूव॑वत्‌ इन को अपनाएंगें ।इस पुस्तक का प्रथम सस्करण अ्ल्पकाल में ही समाप्त हो गया था । इस का दूसरा संस्करण गद्यपारिजातविवरण में केवल हिन्दी श्रनुवाद श्रौर टिप्पणियों का निकला था । दोनों को अ्रव्यापकों और विद्यारथियों--दोनों ही ने सर्वत्र ही अपनाया और अपनों ग्रुणग्रांहिता का परिचय दिया। पुस्तक- वितर्को और विक्रेताओं के श्रनुसार इस संस्करण के प्रकाशन के पदचातु विद्यार्थी श्नन्य संस्करणों को लेना पसन्द दौ नहीं करते थे । पुस्तक कौ उपा- देयता श्नौर लेखक्र-सम्पादक के परिश्रम के साफत्य का प्रमाण इस से अधिक श्रीर्‌ क्या हो सकता है । लेखक उन सव पाठकों का आभारी है जिन्होंने ङस संस्करण को इतना अच्छा समका और अपनाय। 1 पाठकों की इस ग्रुणग्राहितों के परिणामस्वरूप पुस्तक का संस्करण समाप्त हो जाने पर भी मांग निरन्तर ग्राती रही । इसे श्राद्योपान्त संशोधित और परिवर्धित करने की इच्छा से इस का प्रकाशन श्रव तक रुका रहा | ईश्वर को कृपा से अनुकूल परिस्थितियां श्राने पर यह सथ्योधन सम्भव हो सका है ।पुस्तक के मुद्रण में प्रफश्ोवन आदि में श्री सुकेशी रानी ग्रुप्ता, एम० ए० तथा श्री सुवोबकुमार ग्रुप्त, श्री अनिलकुमार गुप्त और श्री प्रमोदकुमार गुप्त ने बहुत सहायता की हैं । भारती मन्दिर के इन अ्रधिपतियों ने पुस्तक के प्रकाशन और वितरण की सुव्यवस्था की है। इन सव को धन्यवाद और शुभ भ्राशिपें हूँ । ४




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