नाटक की परख | Natak Ki Parakh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चास्य-कला का उदृगम १४. तक-शक्ति थी और न विश्लेषण-शक्ति | वे प्रकृति के किसी भी अंग का वैज्ञानिक रूप से निरूपण नहीं कर सकते थे । वे प्रकृति से केवल झपनी छुधा शान्ति का वरदान मॉगते ये और समस्त प्रकृति को एक प्रिचित्र देवी घटना समभते थे | वर्षा श्रौर वरान्‍्त दोन। ही उनकी छुथा शान्ति में सहायक होते थे | जल-राशि! तथा नदियाँ उन्हें भोजन के नये पदार्थ प्रस्तुत करती थीं |प्रकृति की जिनर्नजन शक्तियों से उन्हें शान्ति और सारत्वना मिलती उन्ही शक्तियों की वे पूजा करते, उनका श्राबाहन करते तथा उन्हीं के सामने नत-मस्तक होते | इन्हीं शक्तियों में बे जीवन की प्रगति का अनुभव कर उसे नृत्य में परिणत करने की सफल चेष्टा करते ये | मत्य, नाटक क श्रादि-ख्प है | छुधा-शान्ति के पश्चात्‌ इन आदि जातियों में, रवाभाधिक रूप से, प्रशय तथा दालसा की भावना जाग उठी । जैसे-जैगे उनकी दुधा शान्त होती गयी वैसे ही वैसे उनमे लालसा की भावना बढ़ती गयी | एक समय ऐसा आया जब प्रणय का शध टूट गथा श्रौर लालसा श्रवाध गति रो बह चली। प्रणय के बद्दाव तथा लालसा की तरंग में स्त्री-पुरुष, युवा-युवती, सथीग की प्रतीज्ा म॑ गायन तथा दत्य करने श्रीर्‌ प्रकृति के मनोरम तथा फलप्रद स्थलों 4२ जाकर कीड़ा करने लगे | प्रकृति की जो-जो बस्तुएँ उनकी प्रणय-क्रोड़ा में सहयोग देतीं वे उन्हें सख्य-भाव से देखने और समस्त प्रति के पोषक-तत्वों, शक्तिपूर्ण झ्गों तथा सुन्दर रथानों की पूजा करते । अपनी लालसा तथा श्रद्धा को वे श्रपनी रंगरलियों मे शआ्रानन्दपूवक प्रद्शित करते भे | संभवत: ,इन्दीं रंगरलियों में नाठक का बीज निहित था । इन आदि मनुष्यों के गरोहों का जीवन पूणतया श्रद्धासय था उन्होने अपने से अधिक शक्ति शाली सूर्य, वर्षा, चिजली भर बादल के सामने दर मान कर उनका शासन स्वीकार कर लिया था।




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