विश्वभारती पत्रिका | Vishvabharati Patrika

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Vishvabharati Patrika  by हजारीप्रसाद द्विवेदी - Hajariprasad Dwivedi
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4 MB
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102
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लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

हजारीप्रसाद द्विवेदी (19 अगस्त 1907 - 19 मई 1979) हिन्दी निबन्धकार, आलोचक और उपन्यासकार थे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म श्रावण शुक्ल एकादशी संवत् 1964 तदनुसार 19 अगस्त 1907 ई० को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के 'आरत दुबे का छपरा', ओझवलिया नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम श्री अनमोल द्विवेदी और माता का नाम श्रीमती ज्योतिष्मती था। इनका परिवार ज्योतिष विद्या के लिए प्रसिद्ध था। इनके पिता पं॰ अनमोल द्विवेदी संस्कृत के प्रकांड पंडित थे। द्विवेदी जी के बचपन का नाम वैद्यनाथ द्विवेदी था।

द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा गाँव के स्कूल में ही हुई। उन्होंने 1920 में वसरियापुर के मिडिल स्कूल से प्रथम श्रेणी में मिडिल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद उन्होंने गाँव के निकट ही पराशर ब्रह्मचर्य आश्रम में संस्कृत का अध्ययन प्रारंभ किया। सन् 1923 में वे विद्याध्ययन के लिए काशी आये। वहाँ रणवीर संस्कृत पाठशाला, कमच्छा से प्रवेशिका परीक्षा प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। 1927 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी वर्ष भगवती देवी से उनका विवाह सम्पन्न हुआ। 1929 में उन्होंने इंटरमीडिएट और संस्कृत साहित्य में शास्त्री की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1930 में ज्योतिष विषय में आचार्य की उपाधि प्राप्त की। शास्त्री तथा आचार्य दोनों ही परीक्षाओं में उन्हें प्रथम श्रेणी प्राप्त हुई। 8 नवम्बर 1930 से द्विवेदीजी ने शांति निकेतन में हिन्दी का अध्यापन प्रारम्भ किया। वहाँ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर तथा आचार्य क्षितिमोहन सेन के प्रभाव से साहित्य का गहन अध्ययन किया तथा अपना स्वतंत्र लेखन भी व्यवस्थित रूप से आरंभ किया। बीस वर्षों तक शांतिनिकेतन में अध्यापन के उपरान्त द्विवेदीजी ने जुलाई 1950 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। 1957 में राष्ट्रपति द्वारा 'पद्मभूषण' की उपाधि से सम्मानित किये गये।

प्रतिद्वन्द्वियों के विरोध के चलते मई 1960 में द्विवेदीजी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से निष्कासित कर दिये गये। जुलाई 1960 से पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में हिंदी विभाग के प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे। अक्टूबर 1967 में पुनः काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में हिंदी विभागाध्यक्ष होकर लौटे। मार्च 1968 में विश्वविद्यालय के रेक्टर पद पर उनकी नियुक्ति हुई और 25 फरवरी 1970 को इस पद से मुक्त हुए। कुछ समय के लिए 'हिन्दी का ऐतिहासिक व्याकरण' योजना के निदेशक भी बने। कालान्तर में उत्तर प्रदेश हिन्दी ग्रन्थ अकादमी के अध्यक्ष तथा 1972 से आजीवन उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ के उपाध्यक्ष पद पर रहे। 1973 में 'आलोक पर्व' निबन्ध संग्रह के लिए उन्हें 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से सम्मानित किया गया। 4 फरवरी 1979 को पक्षाघात के शिकार हुए और 19 मई 1979 को ब्रेन ट्यूमर से दिल्ली में उनका निधन हो गया।

द्विवेदी जी का व्यक्तित्व बड़ा प्रभावशाली और उनका स्वभाव बड़ा सरल और उदार था। वे हिंदी, अंग्रेज़ी, संस्कृत और बाङ्ला भाषाओं के विद्वान थे। भक्तिकालीन साहित्य का उन्हें अच्छा ज्ञान था। लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की उपाधि देकर उनका विशेष सम्मान किया था।


पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आधुनिक भारतीय चित्रकला । ৭৭कला की शिक्षा प्राप्त कर रहे थे, नंद्लाल बसु, सुरेद्रनाथ गांगुली, वेकटप्पा, असितकुमार हात्दार, समरेंद्रनाथ गुप्त, क्षितीन्द्रनाथ मजुमदार और शेलेन्रनाथ दे। अवनीन्द्रनाथ की शिक्षण - पद्धति पर मी थोड़ा प्रकारा डालना चाहिए 1 आरं स्कूल में चालू शिक्षण प्रणाली की चर्चा करते हुए हम कह चुके हैं कि उसके शिक्षण में कोई उल्लेखयोग्य विशेषता नहीं थी, केवल कुछ विधिविषयक चाते' ही बताई जाती थी1 अवनीन्द्नाथ ने शिक्षण की कोई विशेष शास्त्रीय. पद्धति नहीं प्रस्तुत की । उन्होंने अनुकूल वातावरण की सृष्टि करने तथा स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करने पर बल दिया जो एक सुजनशील कलाकार के लिए आवश्यक हैं। इस उदारता के फलस्वरूप थॉड़ें ही समय में अवनीन्द्र-कछा-शैली के नाम से प्रसिद्ध कला के क्षेत्र में अचुर वेविध्य दिखाई देने लगा । ।अवनीद्धनाथ के आदश के साथ प्राचीन भारतीय आदश को साथ मिला कर पहले पहल एक निश्चित रूप दिया नंदलाल वसु ने । नंदरऊाल ही पहले कलाकार थे जिनकी क्तियों भें हम प्राचीन भारतीय शेली और अलंकरण तत्त्व देखते हैं और यह उनके प्रयास तथा प्रभाव का ही फल है कि भारतीय पद्धति ओर उपकरण कलाकारों तथा कलाप्रेमियों में इतने प्रिय हो गए ।नंदलाल ने विविध रूपों और विधियों में प्रयोग किए। बिना किसी संकोच के यह कहा जा सकता है कि उन्होंने पूर्वीय कला के संपूर्ण विस्तार का अभ्ययन किया। इस विस्तृत ओर विविधपक्षीय ज्ञान के होते हुए भी नंद्लाल की कृतियाँ सदेव सहज रहीं । रंगों की बहुत ही सीमित परिधि के भीतर उन्होंने कृतियों को रखा है, दिन प्रतिदिन उनके कला-हूप सहजतर होते गए। अपनी प्रोढ़ क्ृतियों में अलंकरण के सभी तत्त्व उन्होंने छोड़ दिए हैं। इसके -स्थान पर उन्होंने भारतीय कला के, विशेषहूप से मूर्तिकला के, स्वरूप को समाविष्ट किया है |-- नंद्लाल की प्रतिभा के विकास को समभने के लिए निम्न कृतियों का अध्ययन आवश्यक है:१, रामायण चित्रमाला |२, उमाका शोक३, शबरी की प्रतीक्षा४, स्वणघट ( चित्र पट्टिका )৬. उनके भित्तिचिचऔर १९४० के बाद,के स्याही के रेखांचित्र ।तुलना करने पर हम कह सकते हैं कि अवनीन्द्रनाथ के चित्रण की गीतात्मक शैली कोসিপভৃভাত ने अधिक विषयपरक तथा नाटकीय बनाया। असितकुमार के चित्रों में हमें নু ~ द -६ ५ चश হি हू সে




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