तेलुगु पोतन्न महाभागवतमु [चारों स्कंध] | Telugu Potanna Mahabhagwatamu [skandh 1-4]

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(२७ ) अंत में श्रद्धेय श्री एच० वी० शिवराम शर्माजी का सहयोग अविस्मणीय है। श्री शर्माजी वयोवृद्ध हिन्दीसेवी गौर विद्रान्‌ हँ। हिन्दी मौर तेचुगर व्याकरणों के तुलनात्मक अध्ययन पर .आधधारित इनकी पुस्तक पर्याप्त लोकप्रिय हुई है । श्रीमद्‌भागवत के प्रस्तुत नागरी संस्करण के नवम्‌ (पूर्व), एकादश तथा द्वादश स्कध हमारे इन्हीं विद्रस्मवर कौ देन है । उपरोक्त सभी सहृदय सहयोगी मित्रों के कारण मैं इस बृह॒द्‌ कार्य को संपन्न कर पाया हूँ। स्वयं पोतन्न ने कहा था कि-- “भागवतमु देलिसि पलुकुठ चित्रंबु, शूलिकेत दम्मिचूलिकंत विवुधजनुल वलन विद्लंत कन्नंत, तलियवच्चिनंत तेटपरतु ॥ (1-17) [भागवतमु को समझकर कहना शूली (शिव) या कमलज (ब्रह्मा) | के लिए भी कठिन है। আন: নিভু जवों द्वारा जितना सुना, समझा, उसे स्पष्ट करने का प्रयत्न कङ्गा । | तपःशवितत से संपन्न, परम सात्विक भक्तशिरोमणि मौर सहज पंडित पोतन्न को ही भागवत का अनुवाद कब्टसाध्य प्रतीत हुआ तो हम जैसे लोगों की क्या हस्ती है ? फिर भी हम लोगों ने साहस से काम लिया। स्वसन्रिधानम्‌ सूयेनारायण शस्त्री, आचार्यं डा० दिवाकलं वेंकटावधानी, श्री तिरुमल रामचद्र आदि विद्वानों ने हमारा यथोचित मार्ग- दर्शन किया। श्रीएविकराल कृष्णमाचार्य जी के भागवतामृत नामक पुस्तक (अब तक नो खंड प्रकाशित) से भी हमें पर्याप्त सहायता मिली । डा० वारणासि राममृत्ति 'रेण' जी ने आन्ध्र प्रदेश साहित्य अकादमी के लिए (भागवत परिमलः नाम से प्रहलाद चरित्र, गर्जेद्रमोक्षण, वामनावतार, रुक्मिणी परिणय नामक चार उपाख्यानों का हिन्दी पद्यानुवाद किया था। उस हे है से भी हम लाभान्वित हुए। इन सबका हम हृदय से आभार म | भुवन वाणी दृस्ट के अध्यक्ष श्रद्धेय नंदकुमार जी अवस्थी तथा प्रिय वंधु श्रीविनयकुमार जी अवस्थी के प्रति आभार-प्रदर्शन के लिए हमारे पास शब्द ही नहीं है। इतना ही कह सकता हूँ कि यह प्रयास जितना हमारा है, उतना ही उनका भी है । यदि इस कार्य द्वारा सुधी पाठकों को पोतन्न के भक्ति-पारम्य और काव्य-रचना-कोशल से परिचित करा सकें तो हम अपने प्रयास को सफल मानेंगे । गान्धीनगर, भीपसेव লিল हैदराबाद ५००३८० को




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