इतिहास समुच्य भाषा | Itihas Samuchya Bhasha

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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. . _ इतिहाससमुचचय भाषां; १३. : आचरण करनेके योग्य इस शोक को त्याग करदे ११ २. ज्यासजी कहतेह कि; एसे ब्राह्मरंसे बोधित किया हृश्ना वह राजा अपने पत्रशोक को त्यागकर चित्त से स्वस्थः होगया१ ११हे राजेन्द्र | इससे अब तूभी अपनी साचिकीः युद्धि को प्राप्त होके .अपने ज्ञाति, बन्धु, पुत्रादिकों के शोकको त्याग करटक रान्यको भोग ११७ वैशपायन बोले कि; इस प्रकार वेदव्यासजी से समम्ाया हृश्माभी वह्‌ राजा युधिष्ठिर ज्ञातिशोक से युक्त आत्मावान्‌ हो कर फिर यह वचन बोला ११४ हे स्वज्ञ, ब्रह्मन | आप के वचनो को में श्रद्ापूर्वक मानता हं परन्तु ज्ञाति के बधसे उस्पन्न हुखा शोकं मुभको बलसे बांधरहहि ११६ पुत्र, पौत्र, पिता, पितामह, भानजे, ज्ञातिके जनां समेत बान्धव ११७ और अनेक देशोंसे आयेहुये. राजा महा- राजा इन सबको मैंने राज्यके लोभ से माराहै ११८ सो मुख्य २ यज्ञो के करनेवाले धमं मं निष्ठा र्खनेवाले ऐसे २ राजाओं को -मारकर में कौनसी गति को प्राप्त हंगा११९ ओर है तात ! इन श्रेष्ठ धरमवाले राजालोगों से रहित इस एथ्वी को हम पेसा विचार करते हैं कि 'हम इसको दग्ध करदें १२० क्योंकि उन राजाओं के विना उनकी ख्रियां अपने पति पुत्र पोत्रादि से रहित - होकरकिस दृशा को घरात -होगद किं कुररी के. समान 'शोक से आठों-पहर चिज्लाती हैं १२१ ऐसे उन अब- - 'लाओंके करुणापूर्वक रोदन के शब्द सुनकर कोन जी 'बनकी इच्छा करसक्काहे ३२२ ऐसे मुक्त कूरकर्मी ज्ञाति “कुटुम्बादिके नाश करनेवाले को अब त्रिलोकी का राज्य




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